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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 12
शिलोच्चयपरिभ्रष्टानूपलानुरुविग्रहान् । यांस्तले पातयामासुः शिवसैन्याः किलोध्दुरान् ॥ दूरादापततां तेषां संघट्टादध्वसंस्थिताः । धाराधरारवधराः समुध्दूतरजोभवाः ॥ पृथुलास्तत् क्षणोन्मीलत्प्रचुराग्निकणाकुलाः ॥ उपलाश्शकलीभूताः प्रभूताः परितोऽबरम् । प्रोत्पत्य प्राहरन्नुच्चैस्तदुपेतं द्विषद्वलम् ॥
पर्वत से गिरी हुई जिन प्रचण्ड शिलाओं को शिवाजी के सैनिकों ने नीचे ढकेल दिया था, वे शिलाएं उन्नत स्थान से नीचे गिरते समय आपस में होने वाले भिडंत से तथा मार्ग में स्थित बड़ी शिलाओं के साथ घर्षण होने से उनसे धूल उड़ने लगी एवं तत्क्षण अग्नि की अत्यधिक चिंगारियां निकलने से उनके अनेक तुकड़े होकर वे सर्वत्र आकाश में उड़कर समीप आये हुई उस शत्रु की सेना पर जोर से गिरने लगी।
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