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शिवभारतम् • अध्याय 14 • श्लोक 37
उभावपि युधामत्तौ रक्तनेत्रावुभावपि । उभावपि ससन्नाही महोत्साहावुभावपि ॥ स्वया स्वयासिलतया परिनर्तितया भृशम् । दिवं सौदामिनीद्योतैर्दीपयंतावुभावपि ॥ परस्परान्तरप्रेक्षापरी पञ्चाननस्वरी। भ्रान्तोद्वान्तादिकान् भेदान् दर्शयन्ती विरेजतुः ॥
दोनों ही युद्धकार्य में मदमस्त थे, दोनों के ही नेत्र रक्त की तरह लाल हो गये थे, दोनों ही शख्खों से सुसज्जित थे, दोनों का ही उत्साह महान् था और दोनों ही अपनी-अपनी तलवार को बार-बार घुमाकर आकाशीय विद्युत् की चमक की तरह आकाश को प्रकाशित कर रहे थे, दोनों ही परस्पर की गलतियों को ढूंढते हुए, सिंह जैसी गर्जना कर रहे थे, भ्रान्त, उद्‌द्घान्त आदि पट्टे के प्रकाश दिखाते हुए वे सुशोभित हो रहे थे।
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