दोनों ही युद्धकार्य में मदमस्त थे, दोनों के ही नेत्र रक्त की तरह लाल हो गये थे, दोनों ही शख्खों से सुसज्जित थे, दोनों का ही उत्साह महान् था और दोनों ही अपनी-अपनी तलवार को बार-बार घुमाकर आकाशीय विद्युत् की चमक की तरह आकाश को प्रकाशित कर रहे थे, दोनों ही परस्पर की गलतियों को ढूंढते हुए, सिंह जैसी गर्जना कर रहे थे, भ्रान्त, उद्द्घान्त आदि पट्टे के प्रकाश दिखाते हुए वे सुशोभित हो रहे थे।
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