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अध्याय 1 — मंकि गीता

मंकिगीता
53 श्लोक • केवल अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - (दादाजी!) यदि कोई मनुष्य धन की तृष्णा से ग्रस्त होकर तरह-तरह के उद्योग करने पर भी धन न पा सके तो वह क्या करे, जिससे उसे सुख की प्राप्ति हो सके?
भीष्मजी ने कहा - भारत! सबमें समता का भाव, व्यर्थ परिश्रम का अभाव, सत्य-भाषण, संसार से वैराग्य और कर्मासक्ति का अभाव - ये पाँचों जिस मनुष्य में होते हैं, वह सुखी होता है।
ज्ञानवृद्ध पुरुष इन्हीं पाँच वस्तुओं को शान्ति का कारण बताते हैं। यही स्वर्ग है, यही धर्म है और यही परम उत्तम सुख माना गया है।
युधिष्ठिर! इस विषय में जानकार पुरुष एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। मङ्कि नामक मुनि ने भोगों से विरक्त होकर जो उद्‌गार प्रकट किया था, वही इस इतिहास में वर्णित है। उसे बताता हूँ, सुनो!
मङ्कि धन के लिये अनेक प्रकार की चेष्टाएँ करते थे; परंतु हर बार उनका प्रयत्न व्यर्थ हो जाता था। अन्त में जब बहुत थोड़ा धन शेष रह गया तो उसे देकर उन्होंने दो नये बछड़े खरीदे।
एक दिन उन दोनों बछड़ों को परस्पर जोड़कर वे हल चलाने की शिक्षा देने के लिये ले जा रहे थे। जब वे दोनों बछड़े गाँव से बाहर निकले तो बैठे हुए एक ऊँट को बीच में करके सहसा दौड़ पड़े।
जब वे उसकी गर्दन के पास पहुँचे तो ऊँट के लिये यह असह्य हो उठा। वह रोष में भरकर खड़ा हो गया और उन दोनों बछड़ों को ऊपर लटकाये बड़े जोर से भागने लगा।
बलपूर्वक अपहरण करने वाले उस ऊंट के द्वारा उन दोनों बछड़ों को अपहृत होते और मरते देख मङ्कि ने इस प्रकार कहा-
मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्य में नहीं है, उस धन को वह श्रद्धापूर्वक भली-भाँति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता।
पहले मैंने जो प्रयत्न किया था, उसमें अनेक प्रकार के अनर्थ खड़े हो गये थे। उन अनर्थों से युक्त होने पर भी मैं धनोपार्जन की ही चेष्टा में लगा रहा; परंतु देखो, आज इन बछड़ों की संगति से मुझ पर कैसा दैवी उपद्रव आ गया?
यह ऊँट मेरे बछड़ों को उछाल उछालकर विषम मार्ग से ही जा रहा है। काकतालीयन्याय से (अर्थात् दैवसंयोग से) इन्हें गर्दन पर उठाकर बुरे मार्ग से ही दौड़ रहा है।
इस ऊँट के गले में मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियों के समान लटक रहे हैं। यह केवल दैव की ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थ से क्या होता है? (एक ताड़ के वृक्ष के नीचे एक बटोही बैठा था। उसी वृक्ष के ऊपर एक काक भी आ बैठा। काक के आते ही ताड़ का एक पका हुआ फल नीचे गिरा। यद्यपि फल पककर आप-से-आप ही गिरा था, पर पथिक दोनों बातों को साथ होते देख, यही समझ गया कि कौवे के आने से ही ताड़ का फल गिरा है; अतः जहाँ संयोगवश अचानक कोई घटना घटित हो जाय, वहाँ उसे काकतालीयन्याव से घटित हुई बताया जाता है। यहाँ बछड़ों का आना और ऊँट का रास्ते में बैठे रहना - ये बातें संयोगवश हो गयी थीं।)
यदि कभी कोई पुरुषार्थ सफल होता दिखायी देता है तो वहाँ भी खोज करने पर दैव का ही सहयोग सिद्ध होता है।
अतः सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को धन आदि की ओर से वैराग्य का ही आश्रय लेना चाहिये। धनोपार्जन की चेष्टा से निराश होकर जो विरक्त हो जाता है, वह सुख की नींद सोता है।
अहो! शुकदेव मुनि ने जनक के राजमहल से विशाल वन की ओर जाते समय सब ओर से बन्धनमुक्त हो क्या ही अच्छा कहा था?
जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओं को पा लेता है तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है - इन दोनों के कार्यों में समस्त कामनाओं को प्राप्त करने की अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है।
कोई भी पहले कभी धन आदि के लिये होने वाली सम्पूर्ण प्रवृत्तियों का अन्त नहीं पा सका है। शरीर और जीवन के प्रति मूर्ख मनुष्य की ही तृष्णा बढ़ती है।
ओ कामनाओं के दास मन! तू सब प्रकार की चेष्टाओं से निवृत्त हो जा और वैराग्यपूर्वक शान्ति धारण कर। तू धन की चेष्टा करके बारम्बार ठगा गया है तो भी उसकी ओर से वैराग्य नहीं होता है।
ओ धन की कामना वाले मन! यदि तुझे मेरा विनाश नहीं करना है। यदि तू इसी प्रकार मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहना चाहता है तो मुझे व्यर्थ लोभ में न फँसा।
तूने बार-बार द्रव्य का संचय किया और वह बारम्बार नष्ट होता चला गया। धन की इच्छा रखने वाले मूढः! क्या कभी तू धन की इस तृष्णा और चेष्टा का त्याग भी करेगा?
अहो! यह मेरी कैसी नादानी है? जो मैं तेरे हाथ का खिलौना बना हुआ हूँ। यदि ऐसी बात न होती तो क्या कोई समझदार पुरुष कभी दूसरों की दासता स्वीकार कर सकता है?
पूर्वकाल के तथा पीछे के मनुष्य भी कभी कामनाओं का अन्त नहीं पा सके हैं, अतः मैं समस्त कर्मों का आयोजन त्यागकर सावधान हो गया हूँ और मैं पूर्णतः जग गया हूँ।
काम! निश्चय ही तेरा हृदय फौलाद का बना हुआ है, अतएव अत्यन्त सुदृढ़ है। यही कारण है कि सैकड़ों अनर्थों से व्याप्त होने पर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते।
काम! मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ और जो कुछ तुझे प्रिय लगता है, उससे भी परिचित हूँ। चिरकाल से तेरा प्रिय करने की चेष्टा करता चला आ रहा हूँ; परंतु कभी मेरे मन में सुख का अनुभव नहीं हुआ।
काम! मैं तेरी जड़ को जानता हूँ। निश्चय ही तू संकल्प से उत्पन्न होता है। अब मैं तेरा संकल्प ही नहीं करूँगा, जिससे तू समूल नष्ट हो जायगा।
धन की इच्छा अथवा चेष्टा सुखदायिनी नहीं है। यदि धन मिल भी जाय तो उसकी रक्षा आदि के लिये बड़ी भारी चिन्ता बढ़ जाती है और यदि एक बार मिलकर वह नष्ट हो जाय, तब तो मृत्यु के समान ही भयंकर कष्ट होता है और उद्योग करने पर भी धन मिलेगा या नहीं, यह निश्चय नहीं होता।
शरीर को निछावर कर देने पर भी मनुष्य जब धन नहीं पाता है तो उसके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? यदि धन की उपलब्धि हो भी जाय तो उतने से ही वह सन्तुष्ट नहीं होता है, अपितु अधिक धन की तलाश करने लग जाता है।
काम! स्वादिष्ट गंगाजल के समान यह धन तृष्णा की ही वृद्धि करने वाला है, मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णा की वृद्धि मेरे विनाश का कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे।
मेरे इस शरीर का आश्रय लेकर जो पाँचों भूतों का समुदाय स्थित है, वह इसमें से अपनी इच्छा के अनुसार सुखपूर्वक चला जाय या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है।
पंचभूतगण! अहंकार आदि के साथ तुम सब लोग काम और लोभ के पीछे लगे रहने वाले हो। अतः तुम पर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है। इसलिये मैं समस्त कामनाओं को छोड़कर केवल अब सत्त्वगुण का आश्रय ले रहा हूँ।
मैं अपने शरीर में मन के अंदर सम्पूर्ण भूतों को देखता हुआ बुद्धि को योग में, एकाग्रचित्त को श्रवण-मनन आदि साधनों में और मन को परब्रह्म परमात्मा में लगाकर रोग-शोक से रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकों में अनासक्त भाव से विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखों में न डाल सकेगा।
काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम - इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू ही है। जब तक तू मुझे प्रेरित करके इधर-उधर भटकाता रहेगा, तब तक मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है।
मैं तो समझता हूँ कि धन का नाश होने पर जो अत्यन्त दुःख होता है, वही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जो धन से वंचित हो जाता है, उसे अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमानित करने लगते हैं।
दरिद्र को सहस्र-सहस्त्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन अवस्था में बहुत-से कष्टदायक दोष हैं; और धन में जो सुख का लेश प्रतीत होता है, वह भी दुःखों से ही सम्पादित होता है।
जिस पुरुष के पास धन होने का संदेह होता है, उसे उसका धन लूटने के लिये लुटेरे मार डालते हैं अथवा उसे तरह-तरह की पीड़ाएँ देकर सताते और सदा उद्वेग में डाले रहते हैं।
धनलोलुपता दुःख का कारण है, यह बात बहुत देर के बाद मेरी समझ में आयी हैं। काम! तू जिस-जिसका आश्रय लेता है, उसी-उसी के पीछे पड़ जाता है।
तू तत्त्वज्ञान से रहित और बालक के समान मूढ़ है, तुझे सन्तोष देना कठिन है। आग के समान तेरा पेट भरना असम्भव है। तू यह नहीं जानता कि कौन-सी वस्तु सुलभ है और कौन-सी दुर्लभ।
काम! पाताल के समान तुझे भरना कठिन है। तू मुझे दुःखों में फँसाना चाहता है; किंतु अब तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।
अकस्मात् धन का नाश हो जाने से वैराग्य को प्राप्त होकर मुझे परम सुख मिल गया है। अब मैं भोगों का चिन्तन नहीं करूँगा।
पहले मैं बड़े-बड़े क्लेश सहता था, परंतु ऐसा बुद्धिहीन हो गया था कि 'धन की कामना में कष्ट है,' इस बात को समझ ही नहीं पाता था। परंतु अब धन का नाश होने से उससे वंचित होकर मैं सम्पूर्ण अंगों में क्लेश और चिन्ताओं से मुक्त होकर सुख से सोता हूँ।
काम! मैं अपनी सम्पूर्ण मनोवृत्तियों को दूर हटाकर तेरा परित्याग कर रहा हूँ। अब तू फिर मेरे साथ न तो रह सकेगा और न मौज ही कर सकेगा।
अब जो लोग मुझ पर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्ताव को मैं चुपचाप सह लूँगा। जो लोग मुझे मारे-पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदले में वैसा बर्ताव नहीं करूँगा। द्वेष के योग्य पुरुष का भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उस पर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा।
मैं सदा सन्तुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियों से सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसी से जीवन-निर्वाह करता रहूंगा; परंतु तुझे कभी सफल न होने दूंगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु है।
तू यह अच्छी तरह समझ ले कि मुझे वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और समस्त प्राणियों के प्रति दयाभाव - ये सभी सद्गुण प्राप्त हो गये हैं।
अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणता को चाहिये कि वे मोक्ष की ओर प्रस्थान करने वाले मुझ साधक को छोड़कर चले जायें। अब मैं सत्त्वगुण में स्थित हो गया हूँ।
इस समय काम और लोभ का त्याग करके मैं प्रत्यक्ष ही सुखी हो गया हूँ; अतः अजितेन्द्रिय पुरुष की भाँति अब लोभ में फँसकर दुःख नहीं उठाऊँगा।
मनुष्य जिस-जिस कामना को छोड़ देता है, उस-उसकी ओर से सुखी हो जाता है। कामना के वशीभूत होकर तो वह सर्वदा दुःख ही पाता है।
मनुष्य काम से सम्बन्ध रखने वाला जो कुछ भी रजोगुण हो, उसे दूर कर दे। दुःख, निर्लज्जता और असन्तोष - ये काम और क्रोध से ही उत्पन्न होने वाले हैं।
जैसे ग्रीष्म ऋतु में लोग शीतल जल वाले सरोवर में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अब मैं परब्रह्म में प्रतिष्ठित हो गया हूँ, अतः शान्त हूँ, सब ओर से निर्वाण को प्राप्त हो गया हूँ। अब मुझे केवल सुख-ही-सुख मिल रहा है।
इस लोक में जो विषयों का सुख है तथा परलोक में जो दिव्य एवं महान् सुख है, ये दोनों प्रकार के सुख तृष्णा के क्षय से होने वाले सुख की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता - ये देहधारियों के सात शत्रु हैं। इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है। उन सबके साथ इस महान् शत्रु काम का नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुर में स्थित हो राजा के समान सुखी होऊँगा।
राजन्! इसी बुद्धि का आश्रय लेकर मंकि धन और भोगों से विरक्त हो गये और समस्त कामनाओं का परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त कर लिया।
बछड़ों के नाश को निमित्त बनाकर ही मङ्कि अमृतत्व को प्राप्त हो गये। उन्होंने काम की जड़ काट डाली; इसीलिये महान् सुख प्राप्त कर लिया।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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