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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 31
सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन् मनसि चात्मनः । योगे बुद्धिं श्रुते सत्त्वं मनो ब्रह्मणि धारयन् ॥ विहरिष्याम्यनासक्तः सुखी लोकान् निरामयः । यया मां त्वं पुनर्नैवं दुःखेषु प्रणिधास्यसि ॥
मैं अपने शरीर में मन के अंदर सम्पूर्ण भूतों को देखता हुआ बुद्धि को योग में, एकाग्रचित्त को श्रवण-मनन आदि साधनों में और मन को परब्रह्म परमात्मा में लगाकर रोग-शोक से रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकों में अनासक्त भाव से विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखों में न डाल सकेगा।
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