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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
ईहमानो धनं मङ्किर्भग्नेहश्च पुनः पुनः । केनचिद् धनशेषेण क्रीतवान् दम्यगोयुगम् ॥
मङ्कि धन के लिये अनेक प्रकार की चेष्टाएँ करते थे; परंतु हर बार उनका प्रयत्न व्यर्थ हो जाता था। अन्त में जब बहुत थोड़ा धन शेष रह गया तो उसे देकर उन्होंने दो नये बछड़े खरीदे।
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