कोई भी पहले कभी धन आदि के लिये होने वाली सम्पूर्ण प्रवृत्तियों का अन्त नहीं पा सका है। शरीर और जीवन के प्रति मूर्ख मनुष्य की ही तृष्णा बढ़ती है।
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