परित्यागे न लभते ततो दुःखतरं नु किम् ।
न च तुष्यति लब्धेन भूय एव च मार्गति ॥
शरीर को निछावर कर देने पर भी मनुष्य जब धन नहीं पाता है तो उसके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? यदि धन की उपलब्धि हो भी जाय तो उतने से ही वह सन्तुष्ट नहीं होता है, अपितु अधिक धन की तलाश करने लग जाता है।
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