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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 42
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसितः । द्वेष्ययुक्तः प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम् ॥
अब जो लोग मुझ पर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्ताव को मैं चुपचाप सह लूँगा। जो लोग मुझे मारे-पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदले में वैसा बर्ताव नहीं करूँगा। द्वेष के योग्य पुरुष का भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उस पर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा।
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