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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 34
अवज्ञानसहस्त्रैस्तु दोषाः कष्टतराऽधने । धने सुखकला या तु सापि दुःखैर्विधीयते ॥
दरिद्र को सहस्र-सहस्त्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन अवस्था में बहुत-से कष्टदायक दोष हैं; और धन में जो सुख का लेश प्रतीत होता है, वह भी दुःखों से ही सम्पादित होता है।
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