मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 52
एतां बुद्धि समास्थाय मङ्किर्निर्वेदमागतः । सर्वान् कामान् परित्यज्य प्राप्य ब्रह्म महत्सुखम् ॥
राजन्! इसी बुद्धि का आश्रय लेकर मंकि धन और भोगों से विरक्त हो गये और समस्त कामनाओं का परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त कर लिया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मंकिगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मंकिगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें