राजन्! इसी बुद्धि का आश्रय लेकर मंकि धन और भोगों से विरक्त हो गये और समस्त कामनाओं का परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्म को प्राप्त कर लिया।
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