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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 51
आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् । प्राप्यावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी ॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता - ये देहधारियों के सात शत्रु हैं। इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है। उन सबके साथ इस महान् शत्रु काम का नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुर में स्थित हो राजा के समान सुखी होऊँगा।
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