य इमं मामकं देहं भूतग्रामः समाश्रितः ।
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम् ॥
मेरे इस शरीर का आश्रय लेकर जो पाँचों भूतों का समुदाय स्थित है, वह इसमें से अपनी इच्छा के अनुसार सुखपूर्वक चला जाय या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है।
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