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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 9
न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् । युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनुतिष्ठता ॥
मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्य में नहीं है, उस धन को वह श्रद्धापूर्वक भली-भाँति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता।
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