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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 43
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् । न सकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ॥
मैं सदा सन्तुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियों से सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसी से जीवन-निर्वाह करता रहूंगा; परंतु तुझे कभी सफल न होने दूंगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु है।
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