न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु ।
तस्मादुत्सृज्य. कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम् ॥
पंचभूतगण! अहंकार आदि के साथ तुम सब लोग काम और लोभ के पीछे लगे रहने वाले हो। अतः तुम पर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है। इसलिये मैं समस्त कामनाओं को छोड़कर केवल अब सत्त्वगुण का आश्रय ले रहा हूँ।
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