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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 18
निवर्तस्व विधित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य कामुक । असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे ततः ॥
ओ कामनाओं के दास मन! तू सब प्रकार की चेष्टाओं से निवृत्त हो जा और वैराग्यपूर्वक शान्ति धारण कर। तू धन की चेष्टा करके बारम्बार ठगा गया है तो भी उसकी ओर से वैराग्य नहीं होता है।
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