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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 12
मणी वोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरौ मम। शुद्धं हि. दैवमेवेदं हठेनैवास्ति पौरुषम् ॥
इस ऊँट के गले में मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियों के समान लटक रहे हैं। यह केवल दैव की ही लीला है। हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थ से क्या होता है? (एक ताड़ के वृक्ष के नीचे एक बटोही बैठा था। उसी वृक्ष के ऊपर एक काक भी आ बैठा। काक के आते ही ताड़ का एक पका हुआ फल नीचे गिरा। यद्यपि फल पककर आप-से-आप ही गिरा था, पर पथिक दोनों बातों को साथ होते देख, यही समझ गया कि कौवे के आने से ही ताड़ का फल गिरा है; अतः जहाँ संयोगवश अचानक कोई घटना घटित हो जाय, वहाँ उसे काकतालीयन्याव से घटित हुई बताया जाता है। यहाँ बछड़ों का आना और ऊँट का रास्ते में बैठे रहना - ये बातें संयोगवश हो गयी थीं।)
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