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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 40
अतिक्लेशान् सहामीह नाहं बुद्धयाम्यबुद्धिमान् । निकृतो धननाशेन शये सर्वाङ्गविज्वरः ॥
पहले मैं बड़े-बड़े क्लेश सहता था, परंतु ऐसा बुद्धिहीन हो गया था कि 'धन की कामना में कष्ट है,' इस बात को समझ ही नहीं पाता था। परंतु अब धन का नाश होने से उससे वंचित होकर मैं सम्पूर्ण अंगों में क्लेश और चिन्ताओं से मुक्त होकर सुख से सोता हूँ।
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