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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 28
अनुतर्षल एवार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम् । मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मि सन्त्यज ॥
काम! स्वादिष्ट गंगाजल के समान यह धन तृष्णा की ही वृद्धि करने वाला है, मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णा की वृद्धि मेरे विनाश का कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे।
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