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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 32
त्वया हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते । तृष्णाशोक श्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा ॥
काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम - इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू ही है। जब तक तू मुझे प्रेरित करके इधर-उधर भटकाता रहेगा, तब तक मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है।
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