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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 47
यद् यत् त्यजति कामानां तत् सुखस्याभिपूर्यते । कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते ॥
मनुष्य जिस-जिस कामना को छोड़ देता है, उस-उसकी ओर से सुखी हो जाता है। कामना के वशीभूत होकर तो वह सर्वदा दुःख ही पाता है।
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