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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 50
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥
इस लोक में जो विषयों का सुख है तथा परलोक में जो दिव्य एवं महान् सुख है, ये दोनों प्रकार के सुख तृष्णा के क्षय से होने वाले सुख की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं।
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