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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 37
अतत्त्वज्ञोऽसि बालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः । नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम् ॥
तू तत्त्वज्ञान से रहित और बालक के समान मूढ़ है, तुझे सन्तोष देना कठिन है। आग के समान तेरा पेट भरना असम्भव है। तू यह नहीं जानता कि कौन-सी वस्तु सुलभ है और कौन-सी दुर्लभ।
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