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मंकिगीता • अध्याय 1 • श्लोक 45
तस्मात् कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च। त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम् ॥
अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणता को चाहिये कि वे मोक्ष की ओर प्रस्थान करने वाले मुझ साधक को छोड़कर चले जायें। अब मैं सत्त्वगुण में स्थित हो गया हूँ।
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