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अध्याय 28 — अष्टाविंशति अध्याय
शिवभारतम्
79 श्लोक • केवल अनुवाद
पंडित बोलें - उस भोसले कुल के राजा शिवाजी राजगड़ गये। तो पन्हाळ किले की क्या गति हुई? हे महाबुद्धिमान बताओं।
कवीन्द्र बोले - स्वयं शाएस्तेखान इस प्रांत में है, उधर शिद्धी जोहर है। तब हम दोनों तरफ कैसे युद्ध कर सकते है?
अतः आज पन्हाळ किले को आदिलशाह के अधीन कर दें और तू निकल जा। इधर दुसरे काम उपस्थित हो गये है।
आदिलशाह से उस किले का बदला हम एक क्षण में निश्चित लेंगे यह हमारा भाषण असत्य नहीं होगा।
इस प्रकार अपने दूत के मुख से शिवाजी ने त्र्यंबक भास्कर को संदेश दिया सो उसने मन में विचार करके स्वयं युद्धोत्सुक होते हुए भी स्वामी की आज्ञा को प्रमाण मानकर वह किला विनम्रतापूर्वक अल्लीशाह को दे दिया।
तत्पश्चात् जोहर से मिलकर उसने उससे कुशलक्षेम पूछा और शिवाजी के स्नेह प्राप्ति की इच्छा से उसने उसका अत्यंत सत्कार किया।
अपने को सहायता करने वाली विशाल सेना के साथ समीप आकर मस्तक झुकाकर उसने अपने स्वामी की ओर देखा।
पंडित बोले - 'इसको मत मार' इस मेरी बात को तू मान्य कर, इस जोहर के नाश करने के पीछे भिन्न ही निमित्त हैं।
जब बुद्धिमान शिवाजी राजा पन्हाळ किले में था तब उसके समीप आकर उसको देवी भवानी ने यह बात पहले ही बता दी थी।
तब वह किस कारण से एवं किस प्रकार मृत्यु को प्राप्त हो गया वह सब हे कवीन्द्र! हमें बताओं, क्योंकि तुम कुशल हो।
जिस प्रकार देव अमृतपान करके भी तृप्ति को प्राप्त नहीं होते है, उसी प्रकार भागीरथी के तट पर आपकी वाणी को पुनः पुनः सुनकर भी हमारी तृप्ति नही होती है।
कवीन्द्र बोले - महाबाहु शिवाजी राजा को भवानी देवी ने आज्ञा दी तो वह स्वयं मुगलों की सेना को पराजित करने के लिए सिद्धि के बलवान सेना के व्यूह को भेजकर वापस आ गया एवं पन्हाळगड़ के सौभाग्य से अधीन हो जाने पर तो अति महामूर्ख एवं क्रोधी अल्लीशाह के मन में वह बैठ गया तो अत्यधिक समय तक वह जोहर पर ही क्रोधित रहा।
हे दुष्टबुद्धि! 'तुझ लोभी के पास से अत्यधिक धन लेकर वह जायेगा', यह ज्ञात होते हुए भी तूने उसकी उपेक्षा की।
यदि तुने उसको कैद किया होता तो तेरी आज्ञा के बिना उसका वहाँ से निकल पाना कठिन होता, ऐसा मुझे लगता है।
अतः तू यह और उस राजा द्वारा दिया हुआ धन दे, नहीं तो मेरे हाथ से तेरी मृत्यु होगी।
इस प्रकार आदिलशाह ने उसको पत्र भेजा तथापि वह बलिश्रेष्ठ सिद्दी उससे भयभीत नहीं हुआ।
जब यह आदिलशाह के साथ युद्ध करने में असमर्थ रहा तो तब तुरंत दुर्ग की तरह दुर्गम ऐसे कर्णपुर का उसने आश्रय ले लिया।
तत्पश्चात् उस आदिलशाह ने उसको ज्ञात हुए बिना ही प्रयत्न पूर्वक जोहर को शराब के साथ जहर दे दिया।
उपकार करने वाले जोहर के साथ जिसने अपकार किया उस आदिलशाह की यह कितनी बड़ी मूर्खता है।
देवी की कृपा से वह अमानवीय गति एवं दुर्जेय राजा भोसले, घेरा डालकर स्थित हुई विशाल शत्रुसेना को मोहित करके यदि वह किले से निकल गया तो उसमें उस जोहर का अपराध नहीं है ऐसा हमें प्रतीत होता है।
किन्तु यह अप्रासंगिक है, प्रथम प्रस्तुत किये गये श्रेष्ठ, चंद्रदर्शन से उज्जवल होने वाले अमृत के सागर के समान, विस्तार के साथ वर्णन किये जाने वाले शिवाजी राजा के चरित्र को आप सभी सुनकर अपने हृदय में स्थापित करो।
घेरा डालकर बैठे हुए शिद्दी को अपने पराक्रम से तिरस्कृत करके बलवान् शिवाजी भोसले जैसे राजगड़ पर आता है, तो वही मुगलों का बलवान् सेनापति आश्चर्यजनक युद्ध करके पराक्रम से लड़कर संग्रामदुर्ग को अधीन कर लेता है।
वह वार्ता राजगढ़ पर सुनकर, सभी राजनीतिज्ञों में श्रेष्ठ ऐसा वह शिवाजी राजा सचिवों से इस प्रकार बोला।
शिवराज बोला - अन्य कार्य में व्यस्त होने के कारण से चाक नगरी संग्राम दुर्ग सहित हाथ से निकल गई।
वह अधीन करने में कठिन होने पर भी उस पर स्वयं आक्रमण करके वह किले के साथ मैं अभी ही लेना चाहता हूँ।
किन्तु जो यह दूसरा काम बीच में उपस्थित हो गया हे, उसके लिए हम सब प्रयत्नपूर्वक आगे कार्य करेंगे।
जिसका कोई सहायता करने वाला नहीं है, ऐसे किसी भी मनुष्य के हाथ से इस संसार में शत्रुसेना को पराजित करना असंभव है।
अतः बुद्धिमान् राजा के द्वारा शत्रुओं का नाश करने वाली सेना को बड़े प्रयत्न से सदा संग्रहित करना चाहिए।
जिसके पास बहुत धन नहीं है, ऐसे बड़े राजाओं को भी उस प्रकार की सेना का संग्रह करना नहीं आता है।
धन से धन बढ़ता है, धन से धर्म भी वृद्धि को प्राप्त होता है, धन से काम भी प्राप्त होता है। अतः धन की प्रशंसा होती है।
कुल, शील, आयु, विद्या, पराक्रम, सत्यवादिता, गुणज्ञता गांभीर्य ये सब धन से ही उत्पन्न होता है।
धन से ही लोगों को इहलोक एवं परलोक निश्चितरूप से प्राप्त होता है। धनरहित पुरुष जीवित होते हुए भी जीवित नहीं हैं।
जिसके पास विपुल धन होता है, उसके मित्र होते है, जिसके पास धन होता है, वही पराक्रमी होता है, जिसके पास धन होता है, उसके सभी सहायक होते हैं।
अतः पृथुराजा की तरह अपने सामर्थ्य से इस पृथ्वी से कर वसूल करके, जिस पर इस संसार का आश्रय है, ऐसे उस धन को लेकर आऊँगा।
तत्पश्चात्, अगस्त्य ऋषि ने जिस प्रकार समुद्र से प्रतिशोध लिया, उसी प्रकार उधर दिल्लीपति के मामा से प्रतिशोध लूंगा।
इस प्रकार राजा ने सभा में बैठकर उचित एवं राजनीति युक्त भाषण दिया तो विनयशील सचिव बोलें।
सचिव बोलें - धन ही सब सामर्थ्य से युक्त है, ऐसा जो आप कहते हैं, उस प्रकार नहीं है।
समर्थ व्यक्ति के सामर्थ्य के कारण से ही धन के स्थान पर सामर्थ्य आयेगा, किन्तु असमर्थ के पास में स्थित धन लाभकारी नहीं होता है, वह केवल अनर्थकारी ही होता है।
सभी लोगों के पास जो धन है, वह सब तेरा ही है, यह हम जानते हैं। अतः हे महातेजस्वी! शिवाजी राजा आप मुलुख गिरि पर जाओ।
किन्तु सम्प्रति दिल्लीपति का मामा सेनापति शाएस्तेखान यह संग्रामदुर्ग को जीतकर चिन्तारहित एवं गर्वयुक्त होकर आगे प्रस्थान करके पुणे आकर निवास कर रहा है। हे पराक्रमी राजा! तू राजगढ़ पर है, ऐसा जानकर वह मन से अत्यन्त भयभीत होकर प्रायः वह उसी मार्ग से अपनी सेना को सह्याद्री से नीचे भेजेगा।
सह्याद्री से चलकर आने वाली सेना जिस प्रकार से नीचे अवतरण न कर सकें, उसी प्रकार का प्रयत्न करना चाहिए। पुनः दूसरा सब कुछ करना चाहिए।
सचिव के उस समयोचित वचन को सुनकर उस महाबुद्धिमान् एवं पुण्यशील राजा को वह सम्यक् प्रतीत हुआ।
पण्डित बोले - तिहत्तर हजार घुड़सवारों के साथ शाएस्तेखान ने पुणे में स्थित होकर क्या कर लिया?
कवीन्द्र बोला - सामने स्थित कारतलब नाम के कार्यकर्ता यवन को बुलाकर उसे एकान्त में इस प्रकार कहा।
शास्ताखान बोला - तेरे पिता अजबड वंश के पराक्रमी जसवंत थे और तू भी अपनी आयु युद्ध में ही व्यतीत कर रहा है।
प्रबल गालिब को जीतकर सम्प्रति अपनी शक्ति से प्रचण्डपुर को लेकर तुमने मुझे दे दिया।
दुर्जेय वह सह्याद्री का अधिपति शिवाजी युद्ध में किस प्रकार से कठिन कार्यों को करता है, यह तुझे भी पता ही है।
सह्याद्रि पर आक्रमण किये बिना वह दुर्जेय एवं अभिमानी सह्याद्रिपति हमारे हाथों में नहीं आयेगा।
अतः मेरी आज्ञा से तू आज ही सेना के साथ तुरन्त सह्याद्रि से बलात अवतरित होने का विचार बना।
हे वीर! आज से मैं तुम्हारे अधीन हूं। सह्याद्रि से उतरने पर मुझे महान् यश को प्राप्त करा दो।
चौल, कल्याण, भिवंडी, पनवेल, नागस्थान, ये तू अपने अधीन कर लेना।
महान् बलवान् एवं पराक्रमी कच्छप एवं चव्हाण, अमरसिंह मित्रसेन एवं उसका भाई, सर्जेराव गाढे, दुर्जेय राजव्याघ्री, जसवंत कोकाटे, महाबाहु जाधव, इन अत्यन्त माननीयों को मैं सेनासहित प्रेषित करूंगा, विरोचन के पीछे से जैसे असु गये थे उसी प्रकार तेरे पीछे से ये आयेंगे।
सम्पूर्ण सेना का सेनापति बनकर तू आगे चिंतारहित होकर चल। अत्यन्त प्रियकारी तेरे पृष्ठभाग की मैं रक्षा करूंगा।
इस प्रकार उस सेनापति की आज्ञा होते ही उस विख्यात पराक्रमी वीर ने वीरों के साथ प्रस्थान कर दिया।
तत्पश्चात् लोहगड़ के दक्षिणोत्तर मार्ग का आश्रय लेकर वह निर्भयता के साथ सह्याद्रि से अवतरण करने लगा।
नलिका यन्त्र की तरह उस एकपदी मार्ग से जाते समय वह सेना पग-पग पर अत्यधिक संकुचित हो गई।
इस मार्ग से नीचे की ओर मुख करके जायेंगे, इस प्रकार निश्चित हो जाने पर मुगलसेना के लोग सह्याद्री से नीचे उतर गये।
अपनी सेना के साथ आने वाले उस अभिमानी कारतलब ने अपने शत्रु को शीघ्र नहीं देखा किन्तु वनमात्र देखा।
शत्रुओं से परिपूर्ण किन्तु मानो शून्य दिखने वाले उस वन में जब उसने प्रवेश किया तब मित्रसेनादि ने उसके कड़ अर्थात् कटिभाग को भी नहीं छोड़ा।
जहां वायु भी नहीं थी ऐसे उस महावन में निवास करते समय उसने अपने रक्षणार्थ उपाय भी नहीं सोचा था।
पण्डित बोले - उन झाड़ियों में प्रविष्ट होने वाले शिवाजी के शत्रुओं को हमने अंधकारमय लोक देख लिया, ऐसा प्रतीत हुआ।
प्रतिकूल वायु के प्रवाह में सह्याद्री से नीचे उतरने वाले उन शत्रुओं को शिवाजी ने तभी क्यों नहीं रोका?
सह्याद्री के अधोभाग पर स्थित शिवाजी के उस प्रदेश को अधीन करने के लिए उत्सुक शत्रुओ ने तब उसको क्यों अधीन नहीं किया?
कवीन्द्र बोले - यदि आरम्भ में ही उन शत्रुओं को शिवाजी रोक देता तो वह सेनापति सेना के साथ आकर इस अरण्यसागर में नहीं गिरता।
इस प्रकार का मन में निश्चय करके ही स्वयं समर्थ होते हुए भी उस राजा ने बाहुबल का अभिमान करने वाले उस कारतलब को वहां नहीं रोका था।
फिर सह्याद्री से उतरकर आगे आये हुए उन शत्रुओं पर शिवाजी ने चतुरता के साथ मार्ग में ही आक्रमण कर दिया।
उस वीर द्वारा पूर्व नियोजित पदातियों के सज्जनायकों के आकर उस घने अरण्य में दोनों तरफ से समीप ही स्थित हो जाने पर भी उन दिल्लीपति के सैनिकों को ज्ञात नहीं हुआ।
तत्पश्चात् उबरखंड नामक अरण्य के एकपदी मार्ग पर कारतलब अपनी सेना के साथ आ गया।
फिर तत्क्षण बजने वाले रणभेरी की महान् ध्वनि को सुनकर शिवाजी समीप आ गया, ऐसा जान लिया।
उस शिवाजी के नगाड़े की आवाज को सुनकर कारतलब ने अपने मन को पराक्रम के आवेश से युक्त कर दिया।
तब तुंगारण्य का अधिपति महाबाहु वीर मित्रसेन घोड़े से उतरकर, उन्नत स्थान पर स्थित होकर, अपने वीरों को साथ लेकर तथा वीरासन में स्थित होकर, धनुष को झुकाकर उन पर बाण लगाकर शत्रुओं के विनाश के लिए उनको सज्ज किया, उसी प्रकार अमरसिंहादि दूसरे योद्धा भी युद्ध में खड़े हो गये।
तत्पश्चात् शत्रु शीघ्र तोपों के गोलों से पग-पग पर प्रहार कर रहा है, ऐसा तुरन्त जानकर वह प्रभावी यवन अपनी सेना को इकट्ठा करके खड़ा हो गया।
तब उस अरण्य के मध्यभाग में उस युवा योद्धा के तेज का घर ही हो ऐसे धैर्यवान् धनुर्धारी अमरसिंह ने विचलित न होते हुए अरण्य के मध्यभाग में बाणों की वर्षा करके शत्रुसेना का संहार करते हुए युद्ध को सुशोभित कर दिया।
वन में पलायन करने वाली उस यवनसेना को किसी प्रकार से भयभीत न होते हुए धैर्य धारण करो, ऐसा बोलकर मित्रसेनादि ने अपने अनुपम धनुष पर चढ़ाये गए बाणों की वर्षा से तुरंत शत्रुसेना को रोक दिया।
अमरसिंह एवं मित्रसेन द्वारा वेगपूर्वक छोड़े गए बाणों के द्वारा मारे गए कुछ शत्रु योद्धा शरीर से बहने वाले रक्त से रंजित होकर मूर्च्छा आने से गिर गये।
अत्यन्त भयंकर इस वन में क्रोध से आयी हुई शत्रुओं की सेना अपने प्रबल युद्ध के आवेश को नहीं छोड़ रही है, अतः शीघ्र ही उसके सम्पूर्ण मार्ग को तुम रोक दो, इस प्रकार शिवाजी ने सेनापति से कहा।
फिर शत्रुओं का वध करने के लिए घोड़े पर चढ़कर संसार में उत्कर्ष को उत्पन्न करने वाले धनुष को हाथ से खींचने वाला वह शिवाजी प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला के लपटों से खांडव वन को भस्मसात करने वाले अर्जुन के समान देवों एवं असुरों को दिखाई दिया।
शिवाजी के श्रेष्ठ वीरों के तीक्ष्ण एवं लंबी तलवारों के द्वारा गिराये गए, शत्रुपक्ष के घोड़ों के खून से पुराने अरण्य का मध्यभाग सूर्य से भी अधिक लालिमा को धारण करने लगा।
मित्रसेनादि वीरों के द्वारा अविचलित होकर पग-पग पर रक्षा करने पर भी शत्रु पक्ष के योद्धाओं के बाणों की माला के जाल में फंसकर उस सेना की दुर्दशा होने से वह रुक गई।
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