न यत्र पवनस्तत्र यवनः स महावने। निवसन्नवने हेतुमात्मनो न व्यचिन्तयत्।।
जहां वायु भी नहीं थी ऐसे उस महावन में निवास करते समय उसने अपने रक्षणार्थ उपाय भी नहीं सोचा था।
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