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शिवभारतम् • अध्याय 28 • श्लोक 74
अनुवनमपयान्तीं यावनीं वाहिनीं तां बत कथमपि मा भैः स्थैर्यमेहीत्युदीर्य। निरुपमनिजचापारोपितैर्बाणवृन्दैः द्रुतमरुणदमित्रानीकिनीं मित्रसेनः ।।
वन में पलायन करने वाली उस यवनसेना को किसी प्रकार से भयभीत न होते हुए धैर्य धारण करो, ऐसा बोलकर मित्रसेनादि ने अपने अनुपम धनुष पर चढ़ाये गए बाणों की वर्षा से तुरंत शत्रुसेना को रोक दिया।
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