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शिवभारतम् • अध्याय 28 • श्लोक 12
कवीन्द्र उवाच - भगवत्या समादिष्टे शिवभूपे महाभुजे । ध्वजिनीं ताम्रवक्त्राणां पराभवितुमात्मना ।। बलिनं बर्बरव्यूहं सद्यो भित्व विनिर्गते । शिलोच्चये प्रणाले च दैवाद्धस्तमुपागते ।। अल्लीशाहोऽतिमन्दात्मा मन्यमानोऽन्यथात्मनि । चिराय जोहरायैव चुकोप किल कोपनः ।॥
कवीन्द्र बोले - महाबाहु शिवाजी राजा को भवानी देवी ने आज्ञा दी तो वह स्वयं मुगलों की सेना को पराजित करने के लिए सिद्धि के बलवान सेना के व्यूह को भेजकर वापस आ गया एवं पन्हाळगड़ के सौभाग्य से अधीन हो जाने पर तो अति महामूर्ख एवं क्रोधी अल्लीशाह के मन में वह बैठ गया तो अत्यधिक समय तक वह जोहर पर ही क्रोधित रहा।
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