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शिवभारतम् • अध्याय 28 • श्लोक 77
तदनुतुरगारुढस्तूर्ण वधाय विरोधिनाम्, जगति जनितोत्कर्षं कर्षन् करेण शरासनम्। ज्वलितहुतभुग्-ज्वालाजालावलेहितखाण्डवात्, किमपि न पृथासूनोरुनो व्यलोकि सुरासुरैः ।।
फिर शत्रुओं का वध करने के लिए घोड़े पर चढ़कर संसार में उत्कर्ष को उत्पन्न करने वाले धनुष को हाथ से खींचने वाला वह शिवाजी प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला के लपटों से खांडव वन को भस्मसात करने वाले अर्जुन के समान देवों एवं असुरों को दिखाई दिया।
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