इस प्रकार अपने दूत के मुख से शिवाजी ने त्र्यंबक भास्कर को संदेश दिया सो उसने मन में विचार करके स्वयं युद्धोत्सुक होते हुए भी स्वामी की आज्ञा को प्रमाण मानकर वह किला विनम्रतापूर्वक अल्लीशाह को दे दिया।
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