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शिवभारतम् • अध्याय 28 • श्लोक 79
प्रतिपदमविहस्तैर्मित्रसैनादिभिस्तैः, अवितमपि तदिन्द्रप्रस्थसुत्रामसैन्यम्। प्रतिभटविशिखस्रक्पंजराभ्यंतरस्थम्, परिचितदुरवस्थं निर्व्यवस्थं व्यरंसीत्।। इत्यनुपुराणे सूर्यवंशे निधिनिवासकरकवीन्द्रपरमानन्दप्रकाशितायां शतसाहश्यां संहितायां नामाध्यायः ।।
मित्रसेनादि वीरों के द्वारा अविचलित होकर पग-पग पर रक्षा करने पर भी शत्रु पक्ष के योद्धाओं के बाणों की माला के जाल में फंसकर उस सेना की दुर्दशा होने से वह रुक गई।
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