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शिवभारतम् • अध्याय 28 • श्लोक 40
किच संप्रति सेनानीरिन्द्रप्रस्थेन्द्रमातुलः । संग्रामदुर्गमव्यग्रो जित्वा भूत्वा महामनाः ॥ प्रस्थाय वै पुरः पुण्यपुरमास्थाय च स्थितः। निशम्य त्वां महाबाहो शिवपत्तनवर्तिनम्।। भृशं विशंकमानोऽन्तः प्रायस्तेनैव वर्त्मना। सह्यशैलावरोहाय सेनां सम्प्रेषयिष्यति ।।
किन्तु सम्प्रति दिल्लीपति का मामा सेनापति शाएस्तेखान यह संग्रामदुर्ग को जीतकर चिन्तारहित एवं गर्वयुक्त होकर आगे प्रस्थान करके पुणे आकर निवास कर रहा है। हे पराक्रमी राजा! तू राजगढ़ पर है, ऐसा जानकर वह मन से अत्यन्त भयभीत होकर प्रायः वह उसी मार्ग से अपनी सेना को सह्याद्री से नीचे भेजेगा।
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