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अध्याय 3 — त्रिप्रश्नाधिकार:

सूर्य सिद्धांत
51 श्लोक • केवल अनुवाद
जल के द्वारा संशोधित पत्थर की शिलातल पर अथवा वज्लेप (सीमेन्ट या अन्य मसालों) से: बने समतल चबूतरे पर शड्कु के अनुसार अर्थात्‌ अड्ग्गुल के अर्द्धव्यास से वृत्त बनावें।
उस वृत्त के मध्य में १२ अंगुल का एक : शड्कु स्थापित करें। इस शड्कु का छायाग्र वृत्तपरिधि को पूर्वाहन में तथा अपराहन में जहाँ स्पर्श करे उन स्थानों पर बिन्दु बनावें।
ये दोनों बिन्दु पूर्वापर (पूर्व और पश्चिम) संज्ञक होते हैं। इन दोनों बिन्दुओं के मध्य में तिमि (चापों) द्वारा दक्षिणोत्तर रेखा का निर्माण करना चाहिये )।
याम्योत्तर (दक्षिणोत्तर) रेखाओं (दिशाओं) के बीच तिमि (चापों) द्वारा पूर्वापर (पूर्व से पश्चिम) रेखा का निर्माण कर दोनों (पूर्वापर और दक्षिणोत्तर) रेखाओं के मध्य में विदिशाओं (कोणों में जाने वाली रेखाओं) का निर्माण करना चाहिये।
वृत्त परिधिस्थित प्रत्येक दिशा के मध्य बिन्दु से की गई स्पर्श रेखाओं से वृत्त के बाहर एक चतुरस्र (चतुर्भुज) का निर्माण करें। चतुर्भुज के पूर्व अथवा पश्चिम बिन्दु से गणितागत दिशा में छायाग्र-पूर्वापर सूत्रों के अन्तर तुल्य, भुजसूत्र का अड्ग्गुलात्मक मान, पूर्वापर रेखा से इष्टकालिक छायाग्र बिन्दु का मान होता है। अर्थात्‌ छाया की विरुद्ध दिशा में छायाग्रान्तर तुल्य सूर्य का दिगंश होता है।
पूर्व एवं पश्चिम बिन्दु (पूर्वस्वस्तिक एवं पश्चिम स्वस्तिक) से संलग्न पूर्वापर रेखा सममण्डल (पूर्वापर वृत्त) के धरातल में होती है। ऐसा दैवज्ञों का मत है। वही पूर्वापर रेखा उन्मण्डल में अर्थात्‌ उन्मण्डलवृत्त के धरातल में तथा विषुववृत्त (नाडी वृत्त) के धरातल में भी होती है।
पूर्वापर सूत्र के समानानतरा पलभाग्र बिन्दु से जाने वाली रेखा और इष्टच्छायाग्र बिन्दु का अन्तर अग्रा होता है अर्थात्‌ विषुवद्‌ भाग्रगा (पूर्वापर समान्तरा पलभाग्रग रेखा) और इष्ट छायाग्र बिन्दु का अन्तर अग्रा संज्ञक होता है। कर्णवृत्त में परिणत करने पर उसे कर्णवृत्ताग्रा कहते हैं।
शड्कु (१२ अंगुल) और छाया के वर्ग योग का वर्गमूल कर्ण होता है। कर्ण वर्ग से शड्कु वर्ग को घटाकर शेष का वर्गमूल छाया तथा इससे विपरीत अर्थात्‌ कर्ण वर्ग से छाया वर्ग को घटा कर शेष का वर्गमूल शड्कु होता है।
एक महायुग में नक्षत्र चक्र, तीस बार बीस अर्थात्‌ ३० x २० = ६०० बार पूर्व दिशा में परिलम्बित होता है। ६०० से अहर्गण को गुणा कर गुणनफल में युग सावन दिन संख्या से
भाग देने पर प्राप्त लब्धि का भुज बनाकर ३ से गुणा कर उसमें १० का भाग देने से अयबांश होता है। इस अयनांश संस्कृत ग्रह (सायनग्रह) द्वारा क्रान्ति, छाया, चरखण्ड आदि का साधन करना चाहिये।
दोनों अयन बिन्दुओं (सायन कर्क एवं सायन मकर) तथा दोनों विषुव (सायन मेष और सायन तुला) बिन्दुओं पर सूर्य के संक्रमण (संक्रान्ति) के समय अयन चलन (आयन सम्पात की गति) स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। छायार्क (वेधोपलब्ध सूर्य) से गणितागत सूर्य (सूर्य का भोगांश) अल्प होने पर अन्तरांश तुल्य सम्पात से भचक्र पूर्व की ओर चला है।
तथा यदि गणितागत सूर्य का भोगांश अधिक, है तो अन्तरांश तुल्य नक्षत्र चक्र पश्चिम दिशा में चला है ऐसा समझें। इस प्रकार अपने-अपने देश (स्थान) में मध्याहन कालिक दक्षिणोत्तर रेखा में पड़ने वाली विषुवच्छाया (१२ अंगुल शड्कु की छाया) उस स्थान की पलभा होती है।
शड्क और शड्कुच्छाया (पलभा) से पृथक्‌-पृथक्‌ त्रिज्या (३४३८) को गुणाकर गुणन फल को विषुव (पल) कर्ण से भाग देने पर क्रमश: लम्बज्या और अक्षज्या होती है। इनके चापीय मान क्रमश: लम्बांश और अक्षांश होते हैं। उत्तरगोल में अंक्षाश सदैव दक्षिण होते हैं।
मध्याहनकाल में सूर्य की छाया (मध्याहनकालिक शड्कु की छाया) भुजसंत़्क होती है। उस छाया (भुज) से त्रिज्या को गुणाकर गुणनफल में मध्याहन कालिक छाया कर्ण से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो उसकी चापकला मध्याहनकालिक नतांश होती है। यदि छाया (भुज) पूर्वापर सूत्र से दक्षिण हो तो उत्तर नतांश तथा यदि छाया उत्तर दिशा में हो तो दक्षिण नतांश होता है। (उत्तर भुज में दक्षिणनतांश, दक्षिणभुज में उत्तर नतांश होता है।)
यदि सूर्य की क्रान्तिकला और नतांश में परस्पर दिग्भेद (अर्थात्‌ दोनों की दिशायें भिन्न-भिन्न एक की उत्तर दूसरे की दक्षिण) हो तो दोनों का योग करने से तथा यदि दोनों की एक ही दिशा होने पर अन्तर करने से अक्षलिप्ता (अक्षांश कला) होती है।
यक्त अक्षांश से अक्षज्या साधित कर उसके वर्ग को त्रिज्या के वर्ग में घटा कर शेष का वर्गमूल लेने से लम्बज्या होती है। अक्षज्या को १२ से गुणाकर लम्बज्या से भाग देने पर लब्ध फल पलभा होती है।
स्वदेशीय अक्षांश औरं नतांश यदि एक दिशा के हो तो अन्तर, यदि भिन्न दिशा के हो तो योग करने से मध्याहनकाल में सूर्य की क्रान्ति होती है।
क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणाकर परमक्रान्तिज्या से भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो उसका चाप मेषादि तीन राशियों में सायन सूर्य होता है। कर्कादि तीन राशियों में लब्धि को छ: राशि से घटाने से, तुलादि तीन राशियों में छ: राशि में जोड़ने से तथा मकरादि तीन राशियों में द्वादश से घटाने पर शेष मध्याहन कालिक स्पष्ट सायन सूर्य होता है।
गणितागत स्फुट सूर्य से मन्दफल का साधन कर उस का स्पष्ट सूर्य में विलोम॑ संस्कार करें पुन: संस्कृत सूर्य से मन्दफल साधन कर स्पष्ट सूर्य में विलोम संस्कार करें। इस प्रकार असकृत्‌ (बार-बार) संस्कार करने से अहर्गणोत्पन्न मध्यम सूर्य होगा।
अक्षांश और सूर्य के क्रान्त्यंशों की एक दिशा होने पर योग एवं भिन्‍न दिशा होने पर अन्तर करने से सूर्य का मध्याहनकालिक नतांश होता हैं। नतांशों को ९० में घटाने से उनन्‍नतांश होते हैं।
नतांशों की ज्या (भुजज्या) को दृग्ज्या कहते हैं और उन्‍नतांशों की ज्या को कोटिज्या या महाशड्कु कहते हैं। भुजज्या को १२ से गुणा कर कोटिज्या से भाग देने पर मध्याहनकालिक छाया तथा द्वादश गुणित त्रिज्या में कोटिज्या का भाग देने से लब्धि मध्याहनकालिक छाया कर्ण होता है।
क्रान्तिज्या को पलकर्ण से गुणाकर द्वादश का भाग देने से अर्काग्रा होती है इस अर्काग्रा को इष्टकालिक छायाकर्ण से गुणाकर मध्यकर्ण अर्थात्‌ त्रिज्या से भाग देने पर स्वकर्णाग्रा होती है।
दक्षिणगोल में कर्णाग्रा और पलभा का योग करने से तथा उत्तर गोल में पलभा में कर्णाग्रा को घटाने से शेष उत्तर भुज होता है। यदि पलभा में कर्णाग्रा न घटे तो कर्णाग्रा में पलभा को घटाने से शेष दक्षिण भुज होता है।
पूर्वापरसूत्र और छायाग्र के बीच में भुज होता है। मध्याहनकालिक भुज ही सदैव मध्याहन कालिक छाया होती है।
लम्बज्या और अक्षज्या को क्रम से पलभा और द्वादश से गुणाकर क्रान्तिज्या का भाग देने से प्राप्त लब्धियाँ सममण्डल छायाकर्ण होती हैं।
जब सूर्य की उत्तरा क्रांति अक्षांशों से अल्प होती है तभी सममण्डलगत सूर्य का छायाकर्ण होता है क्योंकि उसी स्थिति में सूर्य सममण्डल में प्रवेश करेगा। दक्षिणक्रांति होने पर अथवा अभक्षांशों से क्रांति अधिक होने पर स्वक्षितिज के उपर सूर्य का सममण्डल में प्रवेश सम्भव नहीं होता। प्रकारान्‍्तर से सममण्डल कर्ण का साधन - मध्याहनकर्ण को पलभा से गुणाकर मध्याग्रा का भाग देने से सममण्डल कर्ण होता है।
इष्टक्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणाकर लम्बज्या का भाग देने से अग्राज्या होती है।
अग्रा को अभीष्ट कालिक छाया कर्ण से गुणाकर त्रिज्या से भाग देने पर लब्धि अड्गुलादि कर्ण वृत्तीया अग्रा होती है। त्रिज्यावर्ग के आधे से अग्रा का वर्ग घटाकर शेष को १४४ से गुणाकर ७२ युत पलभावर्ग से भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो वह करणी संज्ञक होती है।
१२ गुणित पलभा को अग्रा से गुणाकर पूर्वोक्‍्त हर (७२ युत पलभा के वर्ग) का भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो उसकी फलसंज्ञा होती है।
फल के वर्ग में करणी जोड़कर वर्गमूल लें। इस मूल में दक्षिणगोल में फल घटाने से, तथा
उत्तरगोल में फल जोड़ने से कोण शड़्क सिद्ध होता है। याम्योत्तर सूर्य के भ्रमण करने पर
अग्नि, नैऋत्य, ईशान और वायु कोण का यह शड़क होता है। कोण शड्क और त्रिज्यावर्ग के अंतर का वर्गमूल दृग्ज्या होती है।
कोणशड्क और त्रिज्या के वर्गान्‍्तर के वर्गमूल को 'दृग्ज्या' कहते हैं । कोणीय दृग्जा और त्रिज्या को पृथक पृथक्‌ १२ से गुणाकर कोणशड्क से भाग देने पर लब्धि, सूर्य की स्थिति एवं काल के अनुसार कोणपवृत्त में क्रमश: छाया और छायाकर्ण होता है। अर्थात्‌ जिस स्थान में जिस समय जिस कोण में कोणशड्क होगा उसी स्थान में छाया और छायाकर्ण होंगे।
उत्तरगोल में त्रिज्या में चरज्या जोड़ने से और दक्षिणगोल में त्रिज्या में चरज्या घटाने से अन्त्या होती है। अन्त्या में नतकाल की उत्क्रमज्या घटाने से शेष, इष्टान्त्या होती है।
इष्टान्त्या को अपने अहोगणात्रवृत्त के व्यासार्ध (द्युज्या) से गुणाकर त्रिज्या का भाग देने से छेद (इष्ट हति) होता है।
छेद को लम्बज्या से गुणाकर त्रिज्या का भाग देने से शड्कु होता है। शड्कु के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग में घटाकर वर्गमूल लेने से दृग्ज्या होती है। पूर्वॉक्त रीति से साधित शड्कु और दृग्ज्या से छाया और छायाकर्ण का साधन होता है।
इष्टकालिक छाया से त्रिज्या को गुणाकर छायाकर्ण का भाग देने से लब्धि दृग्ज्या होती है। त्रिज्यावर्ग में इस दृग्ज्या का वर्ग घटाकर वर्गमूल लेने से शड्क होता है।
शड़क को त्रिज्या से गुणाकर स्वलम्बज्या का भाग देने से इष्ट हृति होती है। इस छेद को त्रिज्या से गुणाकर अपनी द्युज्या से भाग देने से उनन्‍नतज्या (इष्टान्त्या) होगी।
इस इष्टान्त्या को स्वकीय अन्त्या में घटाने से शेष नतकाल की उत्क्रमज्या होती है। उत्क्रमज्या पिण्डों से चाप करने से नतासु होते हैं। ये पूर्वाहणकालिक इष्टच्छाया में पूर्व कपाल में (दिन के पूर्वार्ध में) तथा अपराहणकालिक इष्टच्छाया में पश्चिम कपाल में (अपराहण में) नतासु होंगे।
इष्टकालिक कण्विृत्ताग्रा को लम्बज्या से गुणाकर तात्कालिक छायाकर्ण से भाग देने पर इष्टक्रान्तिज्या होती है। इष्टक्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणाकर परमक्रान्तिज्या से भाग देने पर इष्टभुजज्या होती है। इसका चाप राश्यादि इष्टभुज होता है। इस भुज (क्षेत्र) से उत्पन्न सायन रवि चारो पदों में होगा। ( पदज्ञान कर्क्यादौ प्रोज्झत्य चक्रार्धात्‌---इत्यादि रीति से होगा )।
इष्टदिन के पूर्वाहण या अपराहण में या मध्यकाल में स्थापित शड्कु की छायारूप तीन भुजाग्रों पर चिह्न करके अव्यवहित दो दो चिह्नों से दो मत्स्य बनाकर उनके मुखपुच्छगत रेखा करें। फिर मुख पुच्छगत रेखाओं को अपने मार्ग में बढ़ाने से जहाँ संपात हो उस सम्पातबिन्दु को केन्द्र मानकर सम्पातबिन्दु और किसी भुजाग्रबिन्दु के अन्तर के तुल्य त्रिज्या से जो वृत्त बनेगा वह तीनों भुजाग्रचिहनों को स्पर्श करता हुआ जायेगा। यही भाशभ्रमवृत्त है इसी वृत्त में शड़क की छाया भ्रमण करेगी।
तीन राशियों की ज्या को अलग अलग तीन राशि की चुज्या अर्थात्‌ परमाल्पद्युज्या से गुणा कर स्व स्वद्युज्या से भाग देने पर
जो लब्धियाँ प्राप्त हों उनका चाप बनाकर क्रमश: अधोञ्ध: घटाने से मेषादि राशियों के उदयमान होते हैं । यथा - प्रथम फल मेष राशि का दूसरे फल में प्रथम फ़रू को घटाने से वृष राशि का और दूसरे फल को तीसरे फल में घटाने से मिथुन राशि का लड्झोदय मान होगा । मेषराशि के १६७०, वृष राशि के १७९५, मिथुनराशि के १९३५, लड्छोदयासु होते हैं।
पूर्वसाधित लड्लोदयासुओं में अपने देश के चरासु घटाने से तत्तद्‌ राशियों के स्वदेशोदयासु होते हैं। मेषादि तीन राशियों के लड्लोदयासुओं को विलोम क्रम से रखकर उनमें मेषादि राशियों के चरखण्डों को
विपरीत क्रम से जोड़ने पर कर्क आदि तीन राशियों के उदयासु होंगे। मेषादि छ: राशियों के उदयासु ही उत्क्रमगणना से तुलादि छ: राशियों के उदयासु होते हैं।
तात्कालिक (सायन) सूर्य के गतासु या भोग्यासु बनाकर, जिस राशि पर सूर्य हो उस राशि के उदयासुओं से गुणाकर ३० का भाग देने से क्रमश: गत और भोग्य असु होते हैं।
इष्ट घटिकाओं के असुओं में भोग्यासुओं को घटाकर आगे की राशियों के उदयासुओं को भी जहाँ तक घट सके घटाएं। जिस राशि के उदयासु नहीं घट सकें उनको अशुद्ध कहते हैं। घटाने से बचे शेष को ३० से गुणाकर अशुद्ध का भाग देने से जो अंशादि फल मिले उसको अशुद्ध से पूर्व जितनी मेष आदि राशियाँ हों उसमें जोड़ने से अथवा घटाई हुई राशि तथा अंशादिकों के इस अंशादिफल में जोड़ने से तात्कालिक उदय लग्न होता है।
इसी प्रकार भुक्तासुओं को और भुक्तराशियों के उदयासुओं को इष्टघृूटिकाओं में घटाकर पूर्वोक्त रीति से गुणन भजन द्वारा जो अंशादि फल हो उसको पूर्वोक्त अशुद्ध पूर्व मेषादि राशियों में घटाने से लग्न होता है। (यह लग्न सायन होता है इसलिये अयनांश घटाने से निरयण लग्न होगा)।
पूर्व-पश्चिम नत घटिका और तात्कालिक सायन सूर्य से लग्नानयन की भाँति लड्डोदयासुओं से साधन करने से जो राश्यादिक फल प्राप्त हो उसको सूर्य में ऋण-धन (पूर्वनत हो तो ऋण पश्चिमनत हो तो धन) करने से मध्यलग्न (दशम लग्न) होगा ।
लग्न और सूर्य के बीच में जो अल्प हो उसके भोग्यासु तथा जो अधिक हो उसके भुक्तासु साधन कर इन दोनों के योग में अन्तर लग्नासु अर्थात्‌ लग्न और सूर्य के बीच में जितनी राशियाँ हों उनके उदयासुओं को जोड़ने से इष्टकाल होता हैं।
स्पष्टसूर्य से लग्न न्यून हो तो रात्रिशेष में अर्थात्‌ सूर्योदय से पूर्व का इष्टकाल होगा और अधिक हो तो दिन में अर्थात्‌ सूर्योदय के पश्चात्‌ दिन का इष्टकाल होगा। यदि छ: राशियुकत सूर्य से अधिक लग्न हो तो सूर्यास्त के अनन्तर रात्रि का इष्टकाल होगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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