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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 15
स्वकर्णाप्ता थनुलिप्ता नतास्ता दक्षिणे भुजे। उत्तराश्चोत्ते याम्यास्ता: सूर्यक्रान्तिलिप्तिका: का: ॥
यदि सूर्य की क्रान्तिकला और नतांश में परस्पर दिग्भेद (अर्थात्‌ दोनों की दिशायें भिन्न-भिन्न एक की उत्तर दूसरे की दक्षिण) हो तो दोनों का योग करने से तथा यदि दोनों की एक ही दिशा होने पर अन्तर करने से अक्षलिप्ता (अक्षांश कला) होती है।
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