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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 21
शेषं नतांशा: सूर्यस्य तदबाहुज्या च कोटिजा । शड्कुमानाड्गुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम्‌ ॥
नतांशों की ज्या (भुजज्या) को दृग्ज्या कहते हैं और उन्‍नतांशों की ज्या को कोटिज्या या महाशड्कु कहते हैं। भुजज्या को १२ से गुणा कर कोटिज्या से भाग देने पर मध्याहनकालिक छाया तथा द्वादश गुणित त्रिज्या में कोटिज्या का भाग देने से लब्धि मध्याहनकालिक छाया कर्ण होता है।
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