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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 41
छाया भ्रमणमार्गज्ञानम्‌ इष्टेबहिन मध्ये प्राक्‌ पश्चाद्धृते बाहत्रयान्तरे ॥ मत्स्यद्वयान्तरयुतेस्त्रिस्प्कसूत्रेण भाश्रम: ।
इष्टदिन के पूर्वाहण या अपराहण में या मध्यकाल में स्थापित शड्कु की छायारूप तीन भुजाग्रों पर चिह्न करके अव्यवहित दो दो चिह्नों से दो मत्स्य बनाकर उनके मुखपुच्छगत रेखा करें। फिर मुख पुच्छगत रेखाओं को अपने मार्ग में बढ़ाने से जहाँ संपात हो उस सम्पातबिन्दु को केन्द्र मानकर सम्पातबिन्दु और किसी भुजाग्रबिन्दु के अन्तर के तुल्य त्रिज्या से जो वृत्त बनेगा वह तीनों भुजाग्रचिहनों को स्पर्श करता हुआ जायेगा। यही भाशभ्रमवृत्त है इसी वृत्त में शड़क की छाया भ्रमण करेगी।
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