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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 39
उन्नतज्या तया हीना स्वान्त्या शेषस्य कार्मुकम्‌ । उत्क्रमज्याभिरेवं स्यु: प्राकपश्चवार्दधनतासव: ।।
इस इष्टान्त्या को स्वकीय अन्त्या में घटाने से शेष नतकाल की उत्क्रमज्या होती है। उत्क्रमज्या पिण्डों से चाप करने से नतासु होते हैं। ये पूर्वाहणकालिक इष्टच्छाया में पूर्व कपाल में (दिन के पूर्वार्ध में) तथा अपराहणकालिक इष्टच्छाया में पश्चिम कपाल में (अपराहण में) नतासु होंगे।
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