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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 38
शड़कु: सत्रिभजीवाघ्न: सस्‍्वलम्बज्याविभाजित: । छेद: सत्रिज्ययाभ्यस्त: स्वाहोरात्रार्द्भाजित: ।।
शड़क को त्रिज्या से गुणाकर स्वलम्बज्या का भाग देने से इष्ट हृति होती है। इस छेद को त्रिज्या से गुणाकर अपनी द्युज्या से भाग देने से उनन्‍नतज्या (इष्टान्त्या) होगी।
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