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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 5
चतुरस्रं वहि: कुर्यात्‌ सूत्रैर्मध्याद्विनिर्गतै: । भुजसूत्राडगगुलेस्तत्र दत्तैरिष्टप्रभा स्मृता ॥
वृत्त परिधिस्थित प्रत्येक दिशा के मध्य बिन्दु से की गई स्पर्श रेखाओं से वृत्त के बाहर एक चतुरस्र (चतुर्भुज) का निर्माण करें। चतुर्भुज के पूर्व अथवा पश्चिम बिन्दु से गणितागत दिशा में छायाग्र-पूर्वापर सूत्रों के अन्तर तुल्य, भुजसूत्र का अड्ग्गुलात्मक मान, पूर्वापर रेखा से इष्टकालिक छायाग्र बिन्दु का मान होता है। अर्थात्‌ छाया की विरुद्ध दिशा में छायाग्रान्तर तुल्य सूर्य का दिगंश होता है।
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