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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 28
अग्रावशात्‌ कोणशड्कुमाह स्वेष्टकर्णहता भक्ता त्रिज्ययाग्राइगुलादिका । त्रिज्यावर्गार्द्धतोडग्रज्यावर्गोनाद्वादशाहतातू ॥
अग्रा को अभीष्ट कालिक छाया कर्ण से गुणाकर त्रिज्या से भाग देने पर लब्धि अड्गुलादि कर्ण वृत्तीया अग्रा होती है। त्रिज्यावर्ग के आधे से अग्रा का वर्ग घटाकर शेष को १४४ से गुणाकर ७२ युत पलभावर्ग से भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो वह करणी संज्ञक होती है।
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