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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 47
अभीष्टघटिकासु भ्यो भोग्यासून्‌ प्रविशोधयेत्‌ । तद्गत्‌ तदेष्यलग्नासूनेवं यातान्‌ तथोत्क्रमात्‌ ॥
इष्ट घटिकाओं के असुओं में भोग्यासुओं को घटाकर आगे की राशियों के उदयासुओं को भी जहाँ तक घट सके घटाएं। जिस राशि के उदयासु नहीं घट सकें उनको अशुद्ध कहते हैं। घटाने से बचे शेष को ३० से गुणाकर अशुद्ध का भाग देने से जो अंशादि फल मिले उसको अशुद्ध से पूर्व जितनी मेष आदि राशियाँ हों उसमें जोड़ने से अथवा घटाई हुई राशि तथा अंशादिकों के इस अंशादिफल में जोड़ने से तात्कालिक उदय लग्न होता है।
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