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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 37
छायातोनतकालज्ञानम्‌ अभीष्टच्छाययाभ्यस्ता त्रिज्या तत्कर्णभाजिता । दृग्ज्या तद्वर्गसंशुद्धात्‌ त्रिज्यावर्गाज्व यत्‌ पदम्‌ ।।
इष्टकालिक छाया से त्रिज्या को गुणाकर छायाकर्ण का भाग देने से लब्धि दृग्ज्या होती है। त्रिज्यावर्ग में इस दृग्ज्या का वर्ग घटाकर वर्गमूल लेने से शड्क होता है।
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