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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 44
निरक्षोदये भ्य: स्वदेशोदय साधनम्‌ खगाष्टयोअर्थगोडगैका: शरतज्र्यड्डहिमांशव: । स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासव: ।।
पूर्वसाधित लड्लोदयासुओं में अपने देश के चरासु घटाने से तत्तद्‌ राशियों के स्वदेशोदयासु होते हैं। मेषादि तीन राशियों के लड्लोदयासुओं को विलोम क्रम से रखकर उनमें मेषादि राशियों के चरखण्डों को
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