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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 33
दृग्ज्याछायाकर्णयोरानयनम्‌ तत्रिज्यावर्गविश्लेषान्मूल. दृग्ज्याभिधीयते । स्वशड्कुना विभज्याप्ते दृकत्रिज्ये द्वादशाहते ॥ छायाकर्णों तु कोणेषु यथास्वं देशकालयो: ।
कोणशड्क और त्रिज्या के वर्गान्‍्तर के वर्गमूल को 'दृग्ज्या' कहते हैं । कोणीय दृग्जा और त्रिज्या को पृथक पृथक्‌ १२ से गुणाकर कोणशड्क से भाग देने पर लब्धि, सूर्य की स्थिति एवं काल के अनुसार कोणपवृत्त में क्रमश: छाया और छायाकर्ण होता है। अर्थात्‌ जिस स्थान में जिस समय जिस कोण में कोणशड्क होगा उसी स्थान में छाया और छायाकर्ण होंगे।
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