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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 36
त्रिभज्यया भवेच्छड्कुस्तद््ण परिशोधयेत्‌ । त्रिज्यावर्गात्‌ पदं दृग्ज्या छायाकर्णो तु पूर्ववत्‌ ।।
छेद को लम्बज्या से गुणाकर त्रिज्या का भाग देने से शड्कु होता है। शड्कु के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग में घटाकर वर्गमूल लेने से दृग्ज्या होती है। पूर्वॉक्त रीति से साधित शड्कु और दृग्ज्या से छाया और छायाकर्ण का साधन होता है।
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