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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 32
याम्ययोर्विदिशो: शड्कुरेवं याम्योत्तरे रवौ । परिभ्रमति शड्लोस्तु शड्कुरुत्तरयोस्तु सः ।।
अग्नि, नैऋत्य, ईशान और वायु कोण का यह शड़क होता है। कोण शड्क और त्रिज्यावर्ग के अंतर का वर्गमूल दृग्ज्या होती है।
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