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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 3 • श्लोक 40
कर्णगोलीयाग्रावशात्‌ रविसाधनम्‌ इष्टाग्राघ्नी तु लम्बज्या स्वकर्णाइ्गुलभाजिता । त्रिप्रश्गाधिकार: - क्रान्तिज्या सा त्रिजीवाघ्नी परमाफपक्रमोद्धृता ॥ तच्चापं भादिक क्षेत्र पदैस्‍्तत्र भवो रवि:।
इष्टकालिक कण्विृत्ताग्रा को लम्बज्या से गुणाकर तात्कालिक छायाकर्ण से भाग देने पर इष्टक्रान्तिज्या होती है। इष्टक्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणाकर परमक्रान्तिज्या से भाग देने पर इष्टभुजज्या होती है। इसका चाप राश्यादि इष्टभुज होता है। इस भुज (क्षेत्र) से उत्पन्न सायन रवि चारो पदों में होगा। ( पदज्ञान कर्क्यादौ प्रोज्झत्य चक्रार्धात्‌---इत्यादि रीति से होगा )।
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