इष्टकालिक कण्विृत्ताग्रा को लम्बज्या से गुणाकर तात्कालिक छायाकर्ण से भाग देने पर इष्टक्रान्तिज्या होती है। इष्टक्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणाकर परमक्रान्तिज्या से भाग देने पर इष्टभुजज्या होती है। इसका चाप राश्यादि इष्टभुज होता है। इस भुज (क्षेत्र) से उत्पन्न सायन रवि चारो पदों में होगा। ( पदज्ञान कर्क्यादौ प्रोज्झत्य चक्रार्धात्---इत्यादि रीति से होगा )।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सूर्य सिद्धांत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
सूर्य सिद्धांत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।