अध्याय 5 — सकलजननीस्तवः
पञ्चस्तवी
38 श्लोक • केवल अनुवाद
प्रलयकालीन करोड़ों सूर्यों के समान दीप्ति से षडध्वा रूपी अर्थात् वर्णाध्वा, मन्त्राध्वा, पदाध्वा, कलाध्बा, तत्त्वाध्वा और भुवनाध्वा, अथवा मूलाधार, नाभि, हृदय, कंठ, घूमध्य और सहस्रार-इन छः प्रकार से बने हुए घने जंगल को जलाकर अर्थात् भस्म करके अपने प्रकाश विमर्शमय परमधाम में तदूप बने हुए योगियों को (भक्त-जनों को) सर्वोत्तीर्ण अलौकिक परमशिव-धामात्मक स्वरूप दिखाते हुए भैरवात्मक शिव पुरुषकार की जय हो, जो भैरव-पुरुषार्थ संकोच विकासशील होने से नील-उत्पल के समान है और ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति को प्रचुरता से अपने शिवात्मक स्थान से पृथ्वीतत्त्व तक नम्र अर्थात् फैला हुआ है।
मुनिजन, समस्त संसार को उत्पन्न करने वाली आप परापारमेश्वरी भगवती को ही 'कला' अर्थात् अनाश्रितशिव नाम वाली शक्ति कहते हैं, 'आद्या प्रज्ञा' अर्थात् स्वतन्त्र चमत्कारमयो पर प्रतिभारूपिणी शक्ति कहते हैं, 'समय' शिव शक्ति सामरस्यात्मक अवस्था कहते हैं, समरसामनुभूति अहन्ता तथा इदन्ता से रहित अनुत्तर- अकुल में ठहरी हुई चमत्कृति का नाम-करण देते हैं, गुरुं पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्ति कहते हैं, गुरु परंपरा कहते हैं, विनय तन्त्र प्रधान शाख अचवा सच्चिदानन्द-स्वरूप-स्वात्मस्थिति के नाम से विभूषित करते हैं, शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपाय-इन तीन मार्गों का स्वरूप कहते हैं, शिवात्मक परामर्श रूप कहते हैं, आप भगवती को ही मुनिजन पर प्रमातृ रूप परम-प्रमाण और परम-मोक्ष रूप परम निर्वाण करके विभूषित करते हैं इसके अतिरिक्त आप जगज्जननी को ही मुनिजन विधिरूप और महामन्त्रमयो विद्या कहते हैं।
हे माता! जिस देहत्यागक्षणात्मक मृत्यु के समय मुझे अपना पिता, माता, भाई, सखा, अनुचर, घर, पुत्र, गृहिणी, मित्र, धन तथा शरीर-ये सारे के सारे परवश होकर छोड़ने पड़ेंगे, उस समय हे महाप्रकाशमयी भगवती! आप कृपा करके सभी भय, मोह और अन्धकार आदि विघ्नों को काट देना और मुझे अपना तुच्छ सेवक समझ कर दर्शन देना।
हे भगवती! सामने, पीछे, भीतर, बाहर, अनन्त, परिमित, पर, स्थूल, सूक्ष्म, साकार, निराकार, गुप्त, प्रकट, अत्यन्त दूर, समीप, सत् और असत्-इस प्रकार के सारे संसार को जो आपके भक्त-जन "ईं" अर्थात् कामकला का स्वरूप ही देखते हैं। उनके लिये तो आप अपनी उत्तमोत्तमा आज्ञा अर्थात् अनुग्रह धारण करते हैं जिसके फलस्वरूप वे आपके भक्त, समस्त भुवनों की अङ्गनाओं को (शक्तियों) चलायमान करते हैं। भाव यह है कि वे भक्त समस्त संसार पर शासन करते हैं।
हे माता! चन्द्रमा, विष्णु, ब्रह्मा, प्रकृति, जीवात्मा, परमात्मा, सूर्यदेवता, परमशिव का स्वरूप, बौद्धों के श्रेष्ठगुरु बुद्ध, आकाश, वायु, शिव और शक्ति - इन विकल्पात्मक शास्त्रोक्त नामों से सन्त-जन आप महात्रिपुरसुन्दरी को ही पुकारते रहते हैं। भाव यह है कि जितने भी नाम संसार में हैं वे सभी नाम आप जगद्रूपिणी माता के ही हैं।
हे समस्त जगत् को उत्पन्न करने वाली माता! आप, चिच्चमत्कृतिमयो स्वातंत्र्यशक्ति एक होकर भी विश्वमयदशा में पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और आत्मा - इन आठ स्वरूपों में विकसित हुई हैं। यद्यपि आप अपने ही ज्ञानक्रियात्मक स्तनरूपी रश्मिचक्रों की व्याप्ति से अपने विश्वव्यापी असंख्यशक्तियों से झुकी भी हैं, तथापि ऐसा होकर भी आप समस्त जगत् की सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह करने का कार्य अनायास में ही धारण करती हैं। इत्यतः मुझे भी अवश्य धारण करके रक्षा कीजिये अर्थात् अपने अनुत्तर धाम में प्रविष्ट करायें।