मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 5 — सकलजननीस्तवः

पञ्चस्तवी
38 श्लोक • केवल अनुवाद
जन्म-ज्वर-भय और अन्धकार को नष्ट करने में चन्द्रमा के प्रकाश के समान बनी हुई हे जगन्माता ! वाद-विवाद करने वाले जो व्यक्ति आपके पारमार्थिक संवित्स्वरूप को नहीं जानते, वे आपके 'माया-ग्रन्थि' नामक जाल में फंस कर (इधर-उधर) लुढ़कते रहते हैं। इस प्रकार के पारस्परिक (वाद-विवाद रूपी) झगड़े से वे अवश्य नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् भेदभावनात्मक बुद्धि से वे अपने स्वरूप को प्राप्त करने से वंचित रहते हैं। हम तो उनके इस कलह-रूपी जाल में न फंस कर आप भगवती को (शरीर से, वाणी से और मन से) नमस्कार करते हैं और आपके स्वरूप में सदा के लिए समाविष्ट होते हैं।
आपके उस अत्यन्त सुन्दर, अत्यन्त अलौकिक तेज को नमस्कार हो, जो वाणी और तर्क से जाना नहीं जाता, जिसका स्वरूप स्वानुभव-गम्य परमानन्दात्मक ऐश्वर्य को सजग बनाता है, जो अपनी संविद्-रश्मियों से ही नील-पीत आदि समस्त वस्तु-वर्ग को विकसित करता है जैसे सूर्य-प्रकाश से उत्पल-पुष्प विकसित होते हैं, जो प्रकाश ज्ञान-क्रियात्मक स्तनों के गौरव से विनम्र है अर्थात् सदैव विश्वमयरूपता को प्रकट करता है और जिस परम-तेज की आराधना भगवान् शंकर करते रहते हैं। भर विनम्र शब्द का तात्पर्य है कि अलौकिक प्रकाश सदैव विश्वमयरूपता को प्रकट करता है।
इन्द्रकीलगिरि पर पाशुपत-अस्त्र-प्राप्ति के लिए तपस्यां करते हुए अर्जुन की रक्षा करने के हेतु आखेट-क्रिया करते हुए शिकारी का रूप शिवजी ने धारण किया था, अत एव शिवजी के शरीर से उष्ण २ स्वेद-कण निकलते थे मानो उसके नील-रंग वाले शरीर पर वे स्वेद-कण नील-कमल के समान चमकते थे। ऐसे ही शिकारी का रूप धारण करते हुए शिव के पीछे-पीछे शिकारिन का रूप धारण करती हुई पार्वती जी दौड़ती चली जाती थी जिस पार्वती जी को दौड़ने के कारण घुंघचियों की माला वक्षस्थल पर हिलती हुई इधर-उधर वक्षस्थल के दोनों ओर से लुढ़कती थी, और उसके वक्षस्थल के भार भोझ से उसकी कमर झुकी हुई थी - ऐसी ही रूप वाली शिकारिन पार्वती जी की शरण मैं लेता हूं अर्थात् उसमें समावेश करता हूं।
तार्किक सिद्धान्तियों के पारस्परिक वाद-विवाद रूपी प्रधन (युद्ध) अन्त में उन्हें कुछ प्राप्त न होकर आयु की समाप्ति ही करवाता है। स्वरूप-साक्षात्कार-संपत्र आप्तपुरुषों के शास्त्र तो बहुत ही श्रद्धा तथा भक्ति की शक्ति पर निर्भर हैं। मैं तो उपर्युक्त दोनों बातें करने का साहस नहीं रखता हूं। अतः हे गिरिजे! मुझ पर आप प्रसन्न बनिये, अर्थात् अनुग्रह कीजिये, उस के पश्चात् मेरे नेत्रों का विषय बनिये और फिर मेरी संपूर्ण रक्षा कीजिये, क्योंकि संकल्प-विकल्प-रूपी उपद्रवों से युक्त बना हुआ मेरा आश्रयहीन मन लुढ़कता रहता है अर्थात् स्वरूपविश्रांति प्राप्त करने से वंचित रहता है।
हे मेरे मन! न जाने कब, किसके कारण, कहां पर और किस अवस्था में यह शरीर, कुत्तों का, श्मशान अग्नि का, पक्षियों के समूह का ग्रास अर्थात् भोजन बनेगा, इसका अनुमान कोई भी नहीं लगा सकता। अतः इस शरीर का (अहम्-अभिमानात्मक) विश्वास जल्दी छोड़ कर समस्त संसार की जननी परा-पारमेश्वरी शक्ति भगवती की ही शरण ग्रहण कर।
हे देवी! अनुत्तर परमशिव के साथ अभिन्न होने से आप आदि और अन्त से रहित अभेदात्मक प्रेम में रसिक होकर भी, हिमालय के घर में जन्म लेने से पूर्व, पाणि-ग्रहण के समय भगवान् शंकर जी की अर्धागिनी बनीं। इसके अतिरिक्त सकलादि समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाली होकर भी, जो आप हिमालय पर्वत की कन्या बनकर प्रकट हुई, अर्थात् जगत्जननी होकर भी आप हिमालय की पुत्री बन गईं। इस प्रकार का वैषम्य देखकर यही अनुमान लगाया जाता है कि आप का शिव के साथ पाणि-ग्रहण करके गृहिणी बनना तथा हिमालय के घर जन्म लेना एक विनोदमय शृङ्गाररसपूर्ण नाटक-सुख ही है अर्थात् जन्मग्रहण तथा दम्पतीभाव का संपादन रूप संसार, एक आप की सुखमय लीला है।
हे स्वातन्त्र्यशालिनी देवि । कई बुद्धिमान् जन आपके स्वरूप को सत् रूप और कई असत्-स्वरूप अर्थात् वाणी तथा मन का विषय न होने के फलस्वरूप शून्यात्मक कहते हैं। हे परा-शक्ति-रूप माता। कई विद्वान् जन आपका स्वरूप सदसदुभयात्मक कहते हैं, यानी आपका स्वरूप साकार रूप भी है और नियकाररूप भी है। इसके अतिरिक्त कई ज्ञानी-जन कहते हैं कि तत्वदृष्टि से यह कुछ ही नहीं है अर्थात् आपका स्वरूप अनुलेख्य होने से न सत् है, न असत् और न सदसदूप है। इससे मुझे यह अनुमान होता है कि हे पार्वती जी। यह ऊपर वर्णित आपके सभी लक्षण आपकी अप्रतिहता स्वातंत्र्य-शक्ति की केवल क्रीड़ा है और कुछ नहीं है।
जो तेज, अपने करोड़ों बिजलियों के प्रकाश की कान्ति से (सभी) छः चक्रों का वेधन करता है, तथा परमानन्द रूपी अमृतवर्षा से युक्त ऊर्ध्वकुण्डलिनी का स्वरूप धारण करके फिर से अपने आधार अर्थात् मूलाधार-स्थान में प्रवेश करता है - इस प्रकार जिस तेज ने अठतीस किरणों को सोम, सूर्य तथा अग्नि - इन तीन प्रकाशों की अठतीस कलाओं को अपने स्वरूप में लीन किया है और इसौलिए इन तीन तेजों की संघटनात्मक अवस्था धारण करने के फलस्वरूप जो तेज, श्याम-वर्ण वाला बन गया है, तथा ज्ञान क्रिया रूपी स्तनों के विमर्शनात्मक बोझ से जो तेज जगदानन्द रूपी अवस्था की ओर झुका हुआ है, एवं इस रीति से जिस तेज ने अपने अनन्त विश्व-व्यापी शक्ति-चक्र को विकसित किया है, उसी अलौकिक परम-धामात्मक तेज की मैं वन्दना करता हूं अर्थात् उसमें सदा के लिए समाविष्ट होता हूं।
हे कुण्डलिनी-शक्ति-स्वरूप वाली भगवती! (आप) चार पत्तों वाले कमल-स्थान मूलाधार में अवस्थित षद्दल अर्थात् षडाकार भगपुट (षट्कोण) में साढ़े तीन वलयों (पेरों) में मुड़ी हुई होकर देदीप्यमान् बनी हुई हैं। उस सुप्तावस्था में आप दस लाख बिजली, अग्नि तथा सूर्य-प्रकाश के समान चमकती हुई ठहरी हैं। वहां आप अपने कुंडलिनी-स्वरूप का उत्थान करने के लिए प्रथम स्वाधिष्ठान षड्दलात्मक कमल को नादात्मक शूल से काट कर, उसके पश्चात्, मणिपूर नाम वाले दशदल-स्वरूप कमल को, फिर अनाहत चक्र वाले द्वादश कमल को तत्पश्चात् विशुद्ध-चक्रात्मक पोडशदल रूपी कमल का भेदन करके अन्त में आज्ञाचक्रस्थान के द्विदलात्मक कमल में प्रवेश करती हैं उसी द्विदलात्मक आज्ञा चक्र में ठहरी हुई आपको मैं प्रणाम करता हूँ। उसी आपकी उच्चतम अवस्था में समावेश करता हूँ।
हे स्वातंत्र्यशक्तिशालिनी महामाया भगवती। कई बुद्धिमान्जन आपके स्वरूप को कुल अर्थात् पारमेश्वरी शक्ति कहते हैं। अन्य विद्वान् तांत्रिकसंप्रदाय-शाली, आपको अकुल अर्थात् शिव के नाम से पुकारते हैं। अन्य त्रिक-आदि दर्शनवादी आपका स्वरूप उभयात्मक कुलाकुल रूप अर्थात् शिव-शक्ति-सामरस्यात्मक कहते हैं और कई प्रत्यभिज्ञादर्शन-वादी आपको कौल-नाम की उपाधि से विभूषित करते हैं। अन्य विद्वान् तो इन उपर्युक्त चारों स्वरूपों से उत्तीर्ण आपको अनाख्य-स्वरूप ही कहते हैं। हे माता! आप ही बताइये कि ये हम सभी आपके स्वरूप का निश्चय किस रूप से करेंगे।
प्रलयकालीन करोड़ों सूर्यों के समान दीप्ति से षडध्वा रूपी अर्थात् वर्णाध्वा, मन्त्राध्वा, पदाध्वा, कलाध्बा, तत्त्वाध्वा और भुवनाध्वा, अथवा मूलाधार, नाभि, हृदय, कंठ, घूमध्य और सहस्रार-इन छः प्रकार से बने हुए घने जंगल को जलाकर अर्थात् भस्म करके अपने प्रकाश विमर्शमय परमधाम में तदूप बने हुए योगियों को (भक्त-जनों को) सर्वोत्तीर्ण अलौकिक परमशिव-धामात्मक स्वरूप दिखाते हुए भैरवात्मक शिव पुरुषकार की जय हो, जो भैरव-पुरुषार्थ संकोच विकासशील होने से नील-उत्पल के समान है और ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति को प्रचुरता से अपने शिवात्मक स्थान से पृथ्वीतत्त्व तक नम्र अर्थात् फैला हुआ है।
हे पराकुण्डलिनी रूप माता! जब कोई भाग्यशाली भक्त इस सूर्य सोमात्मक प्राणापान रूपी द्वन्द्र का ग्रास करता हुआ अनन्त काल से अविदित मध्य-धाम अर्थात् सुषुम्ना-मार्ग में प्रकाश तथा विमर्श का आश्रय लेकर प्रवेश करता है और इसी प्रकार चित्त प्रलय रूपी अग्नि से अर्थात् हठ पाक प्रशम धारणा से समस्त भेद-प्रचात्मक जगत् का संहार करके ऊर्ध्वकुण्डलिनों की पदवी में प्रवेश करता है तो फिर आपको तीव्रातितीव्र अनुग्रह शक्ति से वह व्यक्ति सदा के लिए परमशिवात्मक अकुल-धाम में प्रवेश करता है।
हे माता! मनुष्य-वर्ग, पशु-वर्ग तथा विद्याधर गन्धर्वादि देव-वर्ग-इस प्रकार के ये सभी तीनों प्राणी-गण संसाररूपी अगाध समुद्र में डूब गये हैं तथा सत्वादि गुणत्रय वृत्तियों के सुख, दुःख, मोह रूपी लहरों की धाराओं में लुढ़कते रहते हैं। अब यदि इनमें से किसी एक प्राणी पर भी आपकी दया-पूर्ण दृष्टि पड़े तो वह देहधारी प्राणी उसी क्षण परमानन्द-दशा को प्राप्त करता है अर्थात् निरावरण चिदाकाश-रूपता को प्राप्त करता है।
हे माता! आप अभीष्टप्राति-पद होने के फलस्वरूप एक कल्प-मञ्जरी के समान सुशोभित बनी हुई हैं, जिस लता के मुख-हाथ आदि सभी अंग मानो प्रियंगु नामक लता की तरह श्याम वर्ण वाली टहनियां हैं। अत्यन्त लाल दिव्य वस्त्र अत्यन्त कोमल पत्ते हैं। चमकता हुआ मोतियों और रत्नों का समूह मानों उस लता के फल बने हुए हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार की वेशभूषा उसके पुष्प हैं और (ज्ञान क्रिया पूर्ण) विकसित दो पुष्ट स्तन मानो उस कल्पमंजरी के झुके हुए फूलों के गुच्छे हैं - इस प्रकार आप के स्वरूप को पूर्णरूपेण ध्यान करने वाले भक्त, परमशिव-घामात्मक चिन्तामणि-पदवी को प्राप्त करते हैं।
हे पार्वती। आप नित्य नवीन पूर्णाहन्ता रूपी अमृत-नदी को धारण करती हैं, जिसमें षट्-चक्राधार रूपी भंवर अवस्थित हैं, अनन्त मन्त्र रूपी लहरों की तरह विद्यमान हैं, स्पन्दमान् करङ्किणी आदि योग-मुद्रा रूपी झाग दृष्टिगोचर है, अनेक प्रकार के दिव्य दर्शन रूपी मगरमच्छ इसमें स्थित हैं और नियमित क्रम से अभ्यास करना ही जिस नदी का प्रवाह है-इस प्रकार यह अमृत नदी चिदानन्दात्मक शिव रूपी अमृत-सागर से प्रेम करती है, अर्थात् उस अमृत-सागर में तन्मय बनने के लिए वेग से उसकी ओर बहती रहती है।
हे माता! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, आत्मा, चन्द्रमा और सूर्य, जिन्होंने संसार-मण्डल-वर्ती सभी कार्य-वर्ग को अपने स्वरूप में समाया है - ऐसे इन स्वरूपों के विकास से आपके स्वरूप की महानता कितनी है - इसका अनुमान कोई भी व्यक्ति नहीं लगा सकता। इसके अतिरिक्त आप की महिमा इतनी अगाध है कि ये सभी आठ मूर्तियां आपके अपरिमित परमाकाश भूमि में इतनी छोटी और सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त होती हैं कि उस आपके परमाकाश भूमि में कहीं भी और किसी प्रकार से दृष्टिगोचर नहीं होती अर्थात् उसी आपके स्वरूप के अथाह समुद्र में बुलबुलों की तरह समा जाती हैं।
मुनिजन, समस्त संसार को उत्पन्न करने वाली आप परापारमेश्वरी भगवती को ही 'कला' अर्थात् अनाश्रितशिव नाम वाली शक्ति कहते हैं, 'आद्या प्रज्ञा' अर्थात् स्वतन्त्र चमत्कारमयो पर प्रतिभारूपिणी शक्ति कहते हैं, 'समय' शिव शक्ति सामरस्यात्मक अवस्था कहते हैं, समरसामनुभूति अहन्ता तथा इदन्ता से रहित अनुत्तर- अकुल में ठहरी हुई चमत्कृति का नाम-करण देते हैं, गुरुं पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्ति कहते हैं, गुरु परंपरा कहते हैं, विनय तन्त्र प्रधान शाख अचवा सच्चिदानन्द-स्वरूप-स्वात्मस्थिति के नाम से विभूषित करते हैं, शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपाय-इन तीन मार्गों का स्वरूप कहते हैं, शिवात्मक परामर्श रूप कहते हैं, आप भगवती को ही मुनिजन पर प्रमातृ रूप परम-प्रमाण और परम-मोक्ष रूप परम निर्वाण करके विभूषित करते हैं इसके अतिरिक्त आप जगज्जननी को ही मुनिजन विधिरूप और महामन्त्रमयो विद्या कहते हैं।
अनथक अभ्यास करता हुआ योगी जब स्वात्म-समावेश की ओर अग्रसर होता है तो प्रथम में उसे दस प्रकार के शब्दों का समूह प्रादुर्भूत होता है। उन समस्त शब्दों के लय होने के पश्चात् विन्दु-विभव अर्थात् अनन्त प्रकारों वाला प्रकाश-पुंज अनुभव होने लगता है, उसके भी शान्त होने के पश्चात् अपने आचारस्थान हृदय में आठ प्रकार के दिव्य शब्द प्रकट होते हैं। उनके भी उपरत होने पर योगी शक्ति, व्यापिनी और समना रूपी परा शक्ति के स्थान पर पहुंच जाता है। तदनन्तर ही यह भाग्यशाली योगी उस स्वात्म-संवित्ति का अनुभव करता है जो चिदानन्द-परामर्श से पूर्ण तथा परापारमेश्वरी का पारमार्थिक परस्वरूप है।
हे माता ! परम आनन्द-स्वरूप से युक्त, अगाध तथा अनन्त शिवैश्वर्य संपन्न, विश्वोत्तीर्ण निराकार, ज्ञान-स्वरूप तथा सदैव पूर्ण करुणामयी, तीनों लोकों की उत्पत्ति करने वाली और उत्तमोत्तम शिव-धाम में ठहरी हुई आप परापारमेश्वरी को, जो भक्तजन स्मरण करते हैं, उन्हें सांसारिक भोगों की प्राप्ति हो अथवा परम - आनन्द रूप मोक्ष-प्राप्ति हो, उन्हें दोनों एक तुल्य हैं। तात्पर्य यह है कि उनके लिए सांसारिक भोग भी मोक्ष पर ही पर्यवसित रहते हैं।
हे परापारमेश्वरी शक्ति! इस समस्त सर्वतत्त्वमय जगत् को लयचिन्तन-धारणा से अपनी पांच भौतिक देह में लीन करके, उस अपने शरीर को भी अपने चित्प्रकाशरूपी हृदय में ठहरा कर हृदयस्थान में प्रवेश कराकर, तत्पश्चात् उस हृदय को पुरुष प्रमाण-प्रमेय-उपाधि-युक्त प्रमाता में मिला कर तदनन्तर वह प्रमाता भी प्रमेयादि-उपाधिरहित प्रकाशात्मक बिन्दु में नियुक्त करके, उसके बाद परप्रकाशात्मक बिन्दु भी पर-नाद अर्थात् अहं परामर्शात्मक गंभीर स्थान में पहुंचाकर, अर्थात् निद्रा और जाग्रत की बीच वाली तुर्यरूपा अवस्था में ले जाकर, तत्पश्चात् उस तुर्यरूप अवस्था को भी पारमार्थिक ज्ञानरूपी परमानन्द के ऐश्वर्य में अर्थात् जगदानन्द रूप अवस्था में लय करके जो जगदानन्द उत्तमोत्तम महान अनुत्तर प्रकाश स्वरूप है, वहां पहुंच कर जो व्यक्ति आप के स्वतंत्र चिदानन्द-घन स्वरूप का साक्षात्कार करता है उसकी जय हो।
हे समस्त जगत् का निर्माण करने वाली माता! हे विधि-स्वरूप सृष्टिकारिणी! हे विद्या-चतुष्टय रूपी देवी! हे स्वात्मरूपता से जानने योग्य! हे अनन्त प्रकार के आचरणों वाली! हे तीन वेदों की उत्पत्ति करने वाली! हे विचित्ररूप अर्थात् अत्यन्त अद्भुतरूप बनी हुई! हे जगत की आद्य अर्थात् समस्त संसार का बीज बनी हुई! हे विनय अर्थात् कौल आदि शास्त्रों के द्वारा सहज ही प्राप्त होने वाली देवी! हे समस्त वेदों का सार बनी हुई! हे स्वच्छन्द नाथ शिव की आज्ञा बनी हुई अर्थात् पांच प्रकार के शास्त्र का स्वरूप बनी हुई! हे अपने स्वातंत्र्यनाम वाले शील महिमा में ठहरने वाली भगवती । सच्चिदानन्दरूप शिव-पद को देने वाली हे देवी! ऐहिक और पारलौकिक कल्याणों की कोषरूपा अर्थात् हे सभी जनों को सुख देने वाली भगवती! हे महादेव शंकर भगवान् की अर्धाङ्गिनी! मुझे अपने स्वरूप में अनुरक्त बना दीजिए अर्थात् मुझे अपना अनुपम दास बनाइये।
हे माता! कैलास-वासी शंकर भगवान् ने ब्रह्माजी का सिर काट कर उसे अपने हाथ का पात्र बनाया, भगवान् विष्णु को अपने त्रिशूल में धंसा कर उन्हें अपने कंधे पर रखकर अपना आभूषण बनाया और कालकूट विष का पान करने से अपने कण्ठ को विभूषित किया। परन्तु यह सारा कार्य शिव ने तब किया जब उसके स्वरूप में आप परा पारमेश्वरी शक्ति ठहरी थीं। भाव यह है कि शिव का सारा चरित्र आपका ही चरित्र था। आपके बिना शिव कुछ भी नहीं कर सकता है।
हे माता! आप सृष्टिरूप कृत्य की अधिष्ठात्री (ब्रह्मा) बन कर जगत् को उत्पन्न करती हैं, स्थितिरूप कृत्य की अधिष्ठात्री (विष्णु) बनी हुई इस भव-अभव तथा अति भवात्मक संसार का पालन करती हैं, संहृति रूप कृत्य की अधिष्ठात्री (रुद्र) नाम से विभूषित होकर इसका संहार करती हैं, तिरोधानकर्म की अधिष्ठात्री अर्थात् ईश्वरदशा को धारण करके इस समस्त जगत् का विधान करती है और सदाशिव-संज्ञा पाकर आप इस जगत् के सभी पाश-आणव आदि मल काटकर इसका अनुग्रह करती है। हे पर्वतराज पुत्री! इस प्रकार आप वास्तव में एक स्वरूप वाली होकर भी सृष्टि-स्थिति-संहार-विलय और अनुग्रह करती हैं। हे पर्वतराज पुत्री! इस प्रकार आप वास्तव में एक स्वरूप वाली होकर भी सृष्टि-स्थिति-संहार-विलय और अनुग्रह रूपी पांच कृत्यों को धारण करके अनेक बन जाती हैं, अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव इन पांच कारणों का स्वरूप धारण करती हैं।
हे माता! काम, क्रोध आदि मानसिक विकारों का नाश करके भी मुनि-जनों के मन सदैव भयग्रस्त होने के कारण आपके अत्यन्त कोमल ज्ञानक्रियात्मक पद-पंकज का स्पर्श नहीं कर पाते। इसलिए हे पार्वती! वेदादि श्रुतियों के शिरोमणि अर्थात् ऋग् आदि तीन वेदों में जो प्रधान बने हुए उपनिषद् भाग हैं, स्वभाव से वे सारे उपनिषद् अकोमल और कर्कश हैं वे आपके कोमलतम स्थान को कैसे प्राप्त हो सकते हैं अथवा प्राप्त करा सकते हैं।
हे माता! सन्त-जन आपको सदा रहने वाली बिजली की रेखा के समान, बिना तटों के अमृत-नदी-तुल्य, कलंक-रहित, चांदनी के सदृश, सत्त्व आदि गुण रूपी ग्रन्थियों से रहित प्रकृति के समान, वाणी का अविषय बनी हुई विद्या के तुल्य, ज्ञानक्रिया-रूपी स्तनयुग्मों के अविनत होकर भी अर्थात् ज्ञानक्रिया-शक्तियों के बहिर्भावावस्था न प्राप्त करते हुए ही जगत् की उत्पत्ति करने वाली माता के समान, तथा न समाप्त होने वाली लक्ष्मी के समान अर्थात् मोक्ष लक्ष्मी रूपा वर्णन करते हैं।
हे पर्वतराज पुत्री! यह चेतन पुरुष केवल पृथ्वी आदि पांच भूतों से निर्मित बने हुए अपने शरीर को वेदकरूपता से और सुख तथा दुःख की वेद्यरूपता से जान लेता है अर्थात् पांच भौतिक जड़ शरीर पर आत्माभिमान धारण करता है। इत्यतः आपके रहस्यमय गुरु-मुख से वश्चित बना हुआ यह देहधारी अपने शरीर का आत्माभिमान छोड़ने के लिये समर्थ नहीं होता, यद्यपि उसे भली-भांति यह ज्ञान है कि यह मेरा शरीर जड़ ही है।
हे माता! जिस देहत्यागक्षणात्मक मृत्यु के समय मुझे अपना पिता, माता, भाई, सखा, अनुचर, घर, पुत्र, गृहिणी, मित्र, धन तथा शरीर-ये सारे के सारे परवश होकर छोड़ने पड़ेंगे, उस समय हे महाप्रकाशमयी भगवती! आप कृपा करके सभी भय, मोह और अन्धकार आदि विघ्नों को काट देना और मुझे अपना तुच्छ सेवक समझ कर दर्शन देना।
हे जगज्जननी मां! सृष्टि के आरम्भ में पहिले आप राजा दक्षप्रजापति की पुत्री बन गईं। उसके पश्चात् दोष-युक्त उस प्रजापति का त्याग करके हिमालय की कन्या बनीं। आप यदि तत्त्वदृष्टि से भगवान् शंकर से अभिन्न होकर आदि और अन्त से रहित भी हैं तथापि उस शंकर भगवान् के साथ विवाह करके उनकी पत्नी बन गईं। इस प्रकार के आप के लीलामय चरित को कौन जान सकता है अर्थात् आपका लीलामय-स्वातंत्र्य सर्वथा अगम्य है ।
हे भगवती! सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि सभी प्रकाश आपकी रश्मियों के कण-मात्र हैं। परिपूर्ण शिव रूप ब्रह्म भी आपके महान् तेज के सामने क्षुद्र अर्थात् तुच्छ बना हुआ उस आपके अगाध तेज का एक कण है - यह तो मैंने समझ लिया है। इसके अतिरिक्त शिव तत्त्व से लेकर पृथ्वी तक सभी तत्त्व भी त्रिवलयाकार कुण्डलिनी के बीच में ठहरे हुए हैं। इस प्रकार आपका आश्चर्यपूर्ण स्वरूप आपके भक्त के हृदय में अनुभव किया जाता है।
हे माता! जो शिव आपकी ही परापरारूपिणी ज्ञान-शक्ति से समस्त प्रमाण-प्रमेयादि जगत् को जान लेता है, आपकी ही अपराशक्ति-रूपा क्रियाशक्ति से इस जगन्मण्डल की रचना करता है और आपकी ही परारूपा इच्छा शक्ति से इस जगत् को फिर से अपने स्वरूप में लय करके संहत करता है। इसके अतिरिक्त जिस शिव की सभी आठ मूर्तियां आप ही बनी हुई हैं, इस प्रकार जो शिव आपके स्वरूप साम्य को प्राप्त हुआ परमाकाशरूप शून्य-धाम में चला गया है, अर्थात् सदा के लिए आपके स्वरूप में लीन होकर अपनी सत्ता समाप्त करता है, ऐसा होकर भी आप इस शिव की अनाख्य रूपता को छोड़कर इसके साथ फिर से विहार करती है यह तो क्या है? अर्थात् यह आपकी लीला मुझे आश्चर्य चकित कर देती है।
हे भगवती! सामने, पीछे, भीतर, बाहर, अनन्त, परिमित, पर, स्थूल, सूक्ष्म, साकार, निराकार, गुप्त, प्रकट, अत्यन्त दूर, समीप, सत् और असत्-इस प्रकार के सारे संसार को जो आपके भक्त-जन "ईं" अर्थात् कामकला का स्वरूप ही देखते हैं। उनके लिये तो आप अपनी उत्तमोत्तमा आज्ञा अर्थात् अनुग्रह धारण करते हैं जिसके फलस्वरूप वे आपके भक्त, समस्त भुवनों की अङ्गनाओं को (शक्तियों) चलायमान करते हैं। भाव यह है कि वे भक्त समस्त संसार पर शासन करते हैं।
हे माता! जिस भांति भगवान् सूर्य की किरणें उसी से उदित होकर उसी में लय होती हैं, जिस प्रकार अग्नि की चिंगारियां अग्नि से उदय करके उसी में समाप्त होती हैं और जिस भांति ऊर्मिसंतति से युक्त महान् समुद्र से जल की बून्दै उसी से उदित होकर उसी में चली जाती हैं अर्थात् समा जाती हैं ठीक उसी भांति अपने-अपने तत्त्व संबन्धी श्रेणियों सहित ये सभी छत्तीस तत्त्व आप पारमेश्वरी भगवती से उदित होकर प्रत्येक प्रलयकाल में आपके स्वरूप में विवश होकर समा जाते हैं अर्थात् आपके स्वरूप में ही लय होते हैं।
हे माता! चन्द्रमा, विष्णु, ब्रह्मा, प्रकृति, जीवात्मा, परमात्मा, सूर्यदेवता, परमशिव का स्वरूप, बौद्धों के श्रेष्ठगुरु बुद्ध, आकाश, वायु, शिव और शक्ति - इन विकल्पात्मक शास्त्रोक्त नामों से सन्त-जन आप महात्रिपुरसुन्दरी को ही पुकारते रहते हैं। भाव यह है कि जितने भी नाम संसार में हैं वे सभी नाम आप जगद्रूपिणी माता के ही हैं।
पराशक्ति भगवती के शक्तिपात से पवित्र बने हुए भाग्यशाली भक्त-जन सहजदयामय सद्गुरु के कटाक्ष से अपने परमधाम में प्रविष्ट होकर स्वात्म- स्वरूपात्मिका भगवती को सदा के लिए प्राप्त करते हैं, जो भगवती समस्त षडध्वारूपी अन्धकार को काटने से अत्यन्त करुणामयी है और क्षणमात्र में भक्त की आत्मा को शिवमय बनाती है और इसीलिए परानन्द रूप बनी हुई है।
हे सर्वैश्वर्यसंपन्ना माता! आप ही शिव हैं, आप अनुग्रहकारिणी शक्ति हैं, आप ही सृष्टि आदि द्वादशदेवी-चक्रों में ठहरी हुई विधि अर्थात् उपाय बनी हुई हैं, आप ही समयिनी अर्थात् उन अनाख्य-विधियों का संचालन करने वाली हैं (प्रत्येक अनाख्य-विधियों से साधक को मध्य-धाम में ले जाने वाली हैं), आप ही आत्मा हैं, आप ही आत्म-ज्ञान देने वाली और पाशों को नष्ट करने वाली दीक्षा हैं, ये अणिमादि आठ सिद्धियां भी आप ही हैं, स्वरूप-अख्याति रूपिणी अविद्या और स्वरूप-विकास रूप विद्या भी आप ही हैं। वह कौन सी वस्तु है जो आप नहीं है। आपकी अनुग्रहशक्ति से पवित्र बने हुए हम आपके भक्त आपके स्वरूप से भित्र कुछ भी नहीं देखते हैं।
हे माता! पूर्वकालीन अनन्त जन्मों में देव-नर-पशु-पक्षी आदि शरीरों को धारण करते-करते निरर्गल आपकी अनुग्रहमयी शक्ति से, कर्मफलों के समाप्त होने पर यह अन्तिम जन्म मैंने प्राप्त किया है। इस मोक्षप्राप्ति-प्रद जन्म में भगवान् शंकर को गुरु के रूप में प्राप्त करके, उन शिवरूप गुरु-देव से शैवी दीक्षा से संयुक्त होकर आप परमेश्वरी की क्रमरूपता का अर्थात् आपके नरशक्ति-शिवात्मक त्रिकरूपता का साक्षात्कार करके इस अन्तिम जन्म के शेष दिन आपकी पूजा और स्तुति करते-करते ही बिता दूँ।
जो इच्छाज्ञानक्रिया के शिवशक्त्यात्मक अवस्था में षड्दलरूपी कमल उदित-रूपता में विकास करता है, उस षट्कोण में जो योनि के आकार में कर्णिका है, उसी के बीच में ओंकार का पीठ है, उस पीठ पर ऊर्ध्व-कुण्डलिनी का स्वरूप धारण करती हुई श्यामवर्णवाली ज्ञान-क्रियात्मक स्तनयुगलों से जगदानन्द-पदवी को ओर प्रसारित होती हुई समस्त विश्व को शिवरूपता में प्रकट करती हुई महात्रिपुरसुन्दरी को मैं सदा के लिए प्रणाम करता हूँ अर्थात् उसमें समावेश करता हूँ।
हे समस्त जगत् को उत्पन्न करने वाली माता! आप, चिच्चमत्कृतिमयो स्वातंत्र्यशक्ति एक होकर भी विश्वमयदशा में पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और आत्मा - इन आठ स्वरूपों में विकसित हुई हैं। यद्यपि आप अपने ही ज्ञानक्रियात्मक स्तनरूपी रश्मिचक्रों की व्याप्ति से अपने विश्वव्यापी असंख्यशक्तियों से झुकी भी हैं, तथापि ऐसा होकर भी आप समस्त जगत् की सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह करने का कार्य अनायास में ही धारण करती हैं। इत्यतः मुझे भी अवश्य धारण करके रक्षा कीजिये अर्थात् अपने अनुत्तर धाम में प्रविष्ट करायें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें