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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 1
डों अजानन्तो यान्ति क्षयमवशमन्योन्यकलहै- रमी मायाग्रन्थौ तव परिलुठन्तः समयिनः। जगन्मातर्जन्मज्वरभयतमः कौमुदि ! वयं नमस्ते कुर्वाणाः शरणमुपयामो भगवतीम् ।।
जन्म-ज्वर-भय और अन्धकार को नष्ट करने में चन्द्रमा के प्रकाश के समान बनी हुई हे जगन्माता ! वाद-विवाद करने वाले जो व्यक्ति आपके पारमार्थिक संवित्स्वरूप को नहीं जानते, वे आपके 'माया-ग्रन्थि' नामक जाल में फंस कर (इधर-उधर) लुढ़कते रहते हैं। इस प्रकार के पारस्परिक (वाद-विवाद रूपी) झगड़े से वे अवश्य नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् भेदभावनात्मक बुद्धि से वे अपने स्वरूप को प्राप्त करने से वंचित रहते हैं। हम तो उनके इस कलह-रूपी जाल में न फंस कर आप भगवती को (शरीर से, वाणी से और मन से) नमस्कार करते हैं और आपके स्वरूप में सदा के लिए समाविष्ट होते हैं।
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