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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 22
विधेर्मुण्डं हृत्वा यदकुरुत पात्रं करतले हरिं शूलप्रोतं यदऽगमयदंसाभरणताम्। अलंचक्रे कण्ठं यदपि गरलेनाम्ब ! गिरिशः शिवस्थायाः शक्तेस्तदिदमखिलं ते विलसितम् ।।
हे माता! कैलास-वासी शंकर भगवान् ने ब्रह्माजी का सिर काट कर उसे अपने हाथ का पात्र बनाया, भगवान् विष्णु को अपने त्रिशूल में धंसा कर उन्हें अपने कंधे पर रखकर अपना आभूषण बनाया और कालकूट विष का पान करने से अपने कण्ठ को विभूषित किया। परन्तु यह सारा कार्य शिव ने तब किया जब उसके स्वरूप में आप परा पारमेश्वरी शक्ति ठहरी थीं। भाव यह है कि शिव का सारा चरित्र आपका ही चरित्र था। आपके बिना शिव कुछ भी नहीं कर सकता है।
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